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की के लानें कोसें भैया / महेश कटारे सुगम

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की के लानें कोसें भैया
हम हैं बखत भरोसें भैया

मेंगाई में मौड़ा-मोड़ी
कैसें पालें-पोसें भैया

कैसेंउ अपनौ काम चला रये
लैकें तोसें मोसें भैया

जे ऐसे हैं रोज़ रात कें
पौआ एक ढगोसें[1] भैया

सिक नईं पा रईं अपनी गूदें[2]
कैसें कोउ की सोसें[3] भैया

शब्दार्थ
  1. पीना
  2. चोटें
  3. सोचें