की सखि, साजन? / भाग - 4 / दिनेश बाबा
31.
सांझ-बिहानी रोजे आबै,
घर के सब कारज सोरियाबै,
घरनी जेकरोॅ नाज उठाय,
की सखि साजन?
नैं सखि, दाय।
32.
नारी जौनें सदी बदलकै,
नेकी लेली बदी बदलकै,
पाँच खबैय्या एक्के थाली,
की सखि कुंती?
नैं, पांचाली।
33.
आफत छै हर नगर-निगम में,
छिकै मुसीबत कदम-कदम में,
मोसकिल सें निकलै छै हल,
की सखि ‘बिजली’?
नैं सखि, ‘नल’।
34.
”मोटा“ के गुजराती मानें,
छत हूऐ छै के नैं जानें,
छतरी नाखी सिर पर चादर,
की सखि ‘घोॅर’?
नैं सखि ‘फादर’।
35.
जे हैसियत पर बढ़ै घटै छै,
जेकरो चलतें जेब कटै छै,
जे हरदम धड़काबै दिल,
की सखि ‘पर्स’?
नैं सखि, ‘बिल’।
36.
नारी एक रहै ज्वाला रं,
दैहिक रूप में मधुबाला रं,
पाँच घाट के एक्के नदी,
की सखि कुंती?
नैं, द्रौपदी।
37.
उछलै-कूदै, नाचै गाबै,
बाजा, ढ़ोल बजैनें आबै,
जे मेहमान रहै एक रात,
की सखि उत्सव?
नैं, बारात।
38.
जात-धरम, रिश्ता नैं निभाबै,
नियत समय पर हरदम आबै,
जिनगी के कहलाबै सौत,
की सखि जीवन?
नैं सखि, मौत।
39.
जेकरा बिन जिनगी छै सूना,
चंचल मन भी लगै कहूंना,
दिल छट-पट नै मिलै करार,
की सखि साजन?
नैं सखि, प्यार।
40.
नर जौनें अवतार धरलकै,
दुश्मन के संहार करलकै,
रहै नरायण रं पुरूषार्थ,
की सखि केशव?
नैं सखि, पार्थ।