भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कुँअर कलेऊ खों चलौ स्वामी भीतर चलौ / बुन्देली

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कुँअर कलेऊ खों चलौ स्वामी भीतर चलौ
देखो दूल्हा मचलौ।
न माँगे वौ हाथी घोड़ा न माँगे वौ ऊँट
न जाने वौ का चाहत है ऐसो पड़ गऔ ढीठ।
वौ माँगे न माल खजानौ न सोनौ चाँदी
अरे मैं तो हड़ गई समझा समझा मेरी एक न मानी।
न माँगे वौ हीरा मोती न पन्ना जवरात
दिन भर हो गऔ बैठे बैठे अब तौ हो गई रात।
स्वामी भीतर चलौ अरे कुँअर कलेऊ खों चलौ
देखो दूल्हा मचलौ।
स्वामी आकें हाथ जोड़ कें विनती करन लागे
अरे कहा लाला अब तुम खों चहिये मुख में थोड़ौ बोल।
जब दूल्हा बोलौ है मुख सें बोले मीठी बानी।
गडुआ लैकें घीऊ परसत है उनके दर्शन देओ कराय।
स्वामी भीतर चलौ कुँअर कलेऊ खों चलौ
देखो दूल्हा मचलौ।