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कुछ वादे, कुछ नारे हैं / गोपाल कृष्ण शर्मा 'मृदुल'

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कुछ वादे, कुछ नारे हैं।
ढोंगी पाँव पसारे हैं।।

सूखा हो या बाढ़ घिरे,
उनके वारे-न्यारे हैं।।

कानूनों का ख़ौफ़ नहीं,
ये उनके हत्यारे हैं।।

नदिया, झरने सब उनके,
हमें जलाशय खारे हैं।।

शासन का सुख लूट रहे,
शासन के हरकारे हैं।।

ग़ैरों का क्या जिक्र करें,
हम अपनों के मारे हैं।।