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कुछ सोच के परवाना महफ़िल में जला होगा / 'हफ़ीज़' बनारसी

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कुछ सोच के परवाना महफ़िल में जला होगा
शायद इसी मरने में जीने का मज़ा होगा

गुमराहे-मुहब्बत हूँ पूछो न मेरी मंज़िल
हर नक्शे-क़दम मेरा मंज़िल का पता होगा

कतरा के तो जाते हो दीवाने के रस्ते से
दीवाना लिपट जाए क़दमों से तो क्या होगा

मयखाने से मस्जिद तक मिलते हैं नक़ुशे-पा
या शेख गए होंगे या रिंद गया होगा

फ़रज़ानों का क्या कहना हर बात पर लड़ते हैं
दीवाने से दीवाना शायद ही लड़ा होगा

रिन्दों को 'हफ़ीज़' इतना समझा दे कोई जा कर
आपस में लड़ोगे तुम वायज़ का भला होगा