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कुमुदिनी / मंगल ठाकुर

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धानक फुनगी पर मकड़ा के जाली,
जाली में ओसक बून्द,
चमचम चमकै ओसक जाली,
वसुधा ओढ़ने छथि मोतिक चून
ताहि बगल में छोट-छिन डबरा
डबरा में पोठिया के झुंड

डबरा में ठाढ़ भेलि कुमुदिनी लजायल,
सूर्यसन पुरुष के देखितहिं कुमुदनी
लाजे लेलन्हि अपन आंखि मूंदि

कासक पुष्प,
सेहो ओघांयल सन
नींदक मातल सन,
भोरक भकुआयल सन
लागल जेना कुमुदिनी के लेता चुमि

इ छैक मिथिला के भोरका सुंदरता
एकरा नजरि ककरो नहिं लागै

'और अब प्रस्तुत है इस कविता का हिन्दी अनुवाद

धान की फुनगी पर,
मकड़े की जाली,
जालों पर शबनम की बूंद...
खेत के पास
छोटा-सा डबरा[1]...
डबरे में खेलती पोठी[2] मछलियों के झुंड...

वहीं खड़ी थी कुमुदिनी लजाई,
सूरज-से प्रिय देख,
आँखें लीं मूंद...

कास[3] के फूल, वो भी अघाए-से,
निंदाया-भकुआया, अल्लसुब्बह लगा कि लेगा
लाज से लाल कुमुदिनी को चूम ।

हिन्दी में अनुवादः मंजीत ठाकुर

शब्दार्थ
  1. पोखरा
  2. मछलियों की एक प्रजाति
  3. -बरसात के अंत में खिलने वाला घास का एक फूल