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कूकै आज कविता करडी़ / महेन्द्रसिंह सिसोदिया 'छायण'

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आवौ आज दिखावां दमखम,ढाळा जाजम बीच बजारां|
मांनौ क्यूं नी म्हानै कविवर,रचस्यां म्है ई छंद हजारां||
तेवड़ आ काठी मन मांही,लीनी कलम करां कसमसती|
लाग्या खाल उतारण छंद री,माडै मांडण मन री जचती||

शब्द ज्ञान सूं कोसो आगा,वयणसगाई नीं हैं नैडी़|
भाव नहीं काळजियै आयां,तो ई जा कविता नै छैडी़||
टाळ्या नहीं दोष सब लूंठा,अर दूहा री झडी़ लगा दी|
लय ऊभी आंसू ढळकावै,यति गति नै धूड़ रळा दी||
देख कियो अचरज हंसवाहण,रैगी डोकर हँसती-हँसती|
लाग्यां खाल उतारण छंद री,माडै मांडण मन री जचती||

कुण बतावै म्हांमैं गलती,कुण केवै कै ऊंधा लिख्या|
कुण केवै चौड़े-चोखाळे,छंद कबाडा़ कींकर करिया||
व्यापक व्याकरण हैं म्हारी,गोडा माथै झट घड़ दैवां|
अैडा़ शब्द देखिया नीं थै,वां नै छंदां में मड़ दैवां||
कक्को नीं जाणां कुण केवै,मम मूंगी बातां किम सस्ती|
लाग्यां खाल उतारण छंद री,माडै मांडण मन री जचती||

जो म्हानै समझावै सांचा,वां री बातां नीं मानांलां|
नीं जाणांलां वां नै कांई,मूंछ्यां वां सांमी ताणांलां||
अैडी़ सोच लियौडा़ कविवर,कर डिंगळ सूं माथाफोडी़|
लूट रिया हैं परतख भायां,मचा रिया हैं होडा़-होडी़||
टांग पूंछ जांणै नीं वां कर, कवितावां जावै नित मरती|
लाग्यां खाल उतारण छंद री,माडै मांडण मन री जचती||

दूहौ नीं लिखणौ आवै पण,मोटा-मोटा छंद लिखांलां|
जो केवैलां म्हानै कांई,वां नै म्हैं कोजा भूंडांलां||
म्हैं हा मोटा पंच अठै रा,आखो देस अखाडो़ म्हारौ|
पण कुण जांणै यां पंचां सूं,भाषा रूप बिगड़्यौ सारौ||
कूकै आज कविता करडी़,यां रा हाथां सूं ऊतरती|
लाग्यां खाल उतारण छंद री,माडै मांडण मन री जचती||