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कैसे के बचतई इ गउँआ जवार हो / संजीव कुमार 'मुकेश'

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छुट गेलो खेत-खंधा, बाग-खरिहान हो,
कइसे के बचतई अब, गऊँआ जबार हो।
पीपर के छाँव-छुटल,
कुइंआ के पानी।
नञ् सुनवे बऊआ के,
लोरी अब नानी।
भूल गेलूँ मनवे साथ, तीज-त्योहार हो।
कइसे के बचतई अब,
गऊँआ जबार हो।
छुट गेल संग साथी,
दुअरा-दुआरी।
अहरा आऊ पोखरा सभे,
खेतबा के आरी।
बाबा के साथ जाइले छुटल बजार हो।
कइसे के बचतई अब, गऊँआ जबार हो।
एसी के हावा,
फिरीज के ठंढ़ा पानी।
जड़-मूल भूल गेलूँ,
असली जिन्दगानी।
माय-बाप याद नञ् हे, खाली पगार हो।
कइसे के बचतई अब, गऊँआ जबार हो।
गऊँऐं में थाती हई,
इ असली देश।
चार अक्षर पढ़ के,
बदल लेलूँ भेष।
भूल गेलूँ भाय-माय, गोतीया-परिवार हो।
कइसे के बचतई अब, गऊँआ जबार हो।
लौटऽ पड़तो गाँव,
करऽ पड़तो निदान।
कइसे के बचतई,
अन्नदाता किसान।
उँच-नीच, नञ् हो कोय सभे समान हो।
कइसे के बचतई अब, गऊँआ जबार हो।