भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कैसे खेलें आज होली / शशि पाधा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

आतंक के प्रहार से सहमती है धरा भोली
प्रेम के गुलाल से आओ खेलें आज होली।

घट रही हैं आस्थाएँ
क्षीण होतीं कामनाएँ
आज धरती के नयन से
बह रहीं हैं वेदनाएँ
खो गई हँसी - ठिठोली कैसे खेलें आज होली।

स्नेह का अबीर हो
सदभाव की फुहार हो
धूप अनुराग की
फागुनी बयार हो
हो राग -रंग की रंगोली ऐसी खेलें आज होली।

गांधी आएँ, गौतम आएँ
ईसा और मोहम्मद आएँ
साधु-सन्त देव आएँ
प्रेम की गाथा सुनाएँ
विश्वास से भरी हो झोली मिलजुल खेलें आज होली।

न कोई घर वीरान हो
न संहार के निशान हों
न माँग सूनी हो कोई
अनाथ न सन्तान हो
दिशा- दिशा हो रंग-रोली ऐसी खेलें आज होली।