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कोई दुआ कोई उम्मीद बर नहीं आती / कांतिमोहन 'सोज़'

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चचा ग़ालिब से चुहल

कोई दुआ कोई उम्मीद बर नहीं आती
यहाँ से अब कोई सूरत नज़र नहीं आती ।

वो इब्तिदा थी कि आती थी हाले-दिल पे हँसी
ये इन्तिहा है किसी बात पर नहीं आती ।