कोई समझता नहीं दोस्त, बेबसी मेरी / ज्ञान प्रकाश विवेक

कोई समझता नहीं दोस्त, बेबसी मेरी
महानगर ने चुरा ली है ज़िन्दगी मेरी

तुम्हारी प्रार्थना के शब्द हैं थके हारे
सजा के देखिए कमरे में ख़ामुशी मेरी

मुझे भँवर में डुबो कर सिसकने लगता है
बहुत अजब है समन्दर से दोस्ती मेरी

तुम्हारे बाग का माली मैं बन गया लेकिन
किसी भी फूल पे मरज़ी नहीं चली मेरी

मैं नंगे पाँव हूँ जूते ख़रीद सकता नहीं
कि लोग इसको समझते हैं सादगी मेरी

खड़ा हूँ मश्क लिए मैं उजाड़ सहरा में
किसी की प्यास बुझाना है बन्दगी मेरी

ख़ुदा के वास्ते इस पे न डालिए कीचड़
बची हुई है यही शर्ट आख़री मेरी

तमाम ज़ख़्म मेरे हो गए बहुत बूढे
पुरानी पड़ गई यादों की डायरी मेरी.

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