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कोऊ चले कांपि संग कोऊ उर चांपि चले / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’

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कोऊ चले कांपि संग कोऊ उर चांपि चले
कोऊ चले कछुक अलापि हलबल से ।
कहै रतनाकर सुदेश तजि कोऊ चलै
कोऊ चले कहत संदेश अबिरल से ॥
आंस चले काहू के सु काहू के उसांस चले
काहू के हियै पै चंद्रहास चले हल से ।
ऊधव के चलत चलाचल चली यौं चल
अचल चले और अचले हूँ भये चल से ॥100॥