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कोटा / निशांत

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1)

वे इतने भोले होते हैं
किसी गैंग में शामिल नहीं होते
कोई नशा नहीं करते
घर–घरवालों और अपने बारे में सोचते-सोचते
एक दिन महज शरीर में तब्दील हो जाते हैं

वे पढ़ने आते हैं
पढ़ते पढ़ते लड़ाकू हो जाते हैं
कुछ पढ़ाकू भी
दीन–दुनिया से कट जाते हैं
कौन-सा भूत है जो शिकारी कुत्ते-सा
उनका पीछा करता है

दौड़ते दौड़ते वे कोटा पहुचते हैं
जिसे जीत समझते थे
वह तो एक बूंद भी नहीं है इस संसार के लिए
तब बौद्धत्व की प्राप्ति होती है
ज्ञान से ज़िन्दगी में सब पाते पाते
सब खो गया
सिर्फ औया सिर्फ़
देह को कमरे से बाहर निकाला गया
ज्ञान कोटा में ही रह गया

2)

वे क्या बनना चाहते थे
उन्हें नहीं पता था
जब पता चला
वे कोटा पहुँच चुके थे

एक लड़की अपने पिता की तरह बनना चाहती थी
माँ नफरत करती थी उसके पिता से
एक लड़का माँ बनना चाहता था
पिता के साए से दूर रहना चाहता था
छोटी छोटी इच्छाओं में कैद होकर
वे यहाँ पहुचे थे

दूसरों की सफलता से ज़्यादा ज़रूरी था
अपनी असफलता को रोकना
सफल होना मज़बूरी थी
लज्जा के कीचड़ में गिरने से बचने के लिए
सफलता से पहले वर्जित था
प्रेम के फल का बढ़ना पकना चखना
पढ़ रही थी वह
दांव पर लगी थी परिवार की सफलता

'लगा चुनरी में दाग घर जाऊ कैसे'
सुनते सुनते सो गई एक पूरी गैंग
लड़कियाँ भावुक होती हैं
वो लड़की भी गई इस संसार से
जिसके सामने सारी दुनियाँ
अपने इलाज के लिए झुकाती सर
इतना प्यार वह अपने माँ बाप और अमेरिका रहनेवाली
आइआइतियन बहन से भी नहीं कर पाई थी!
बेचारी लड़की!

चार माएँ–पांच बाप रो रहे थे
एक भाई चुपचाप अपनी माँ को कोस रहा था
बहन की हत्या के लिए
खुद को जिम्मेदार ठहराते हुए

अभाव में स्वभाव ख़राब होता है
महत्त्वकांक्षा में व्यक्ति
सफलता से नहीं लोभ से भ्रष्ट होता है मस्तिष्क
दरअसल सारे लोग
पैसा छापने की मशीन लाना चाहते हैं
बच्चों को कोटा पहुँचाना चाहते हैं

बच्चे क्या बनना चाहते थे
उन्हें पता नहीं था।

3)

चौदह साल की उम्र में
अकबर ने इस देश की बागडोर संभाल ली थी
शिक्षक पिता
इतिहास की किताब पढ़कर सुनाता है
बेटा दसवीं की परीक्षा देगा
कोटा जायेगा

लड़का पिता को देखकर मुस्कुराता है
दरअसल वह अकबर नहीं
अकबर का पिता बनना चाहता है
इतिहास की किताब में जाकर

पिता खांसते है
उनका खांसना पूछना है-ध्यान किधर है?
वह सर झुकाकर
पढ़ने लगता है सामने खुली गणित की किताब

उसकी इच्छा अकबर बनने में नहीं
उसके बाप बनने में है ।

4)

हमारे ज़माने के व्यंग्य और अपमान
तुम्हारे ज़माने में भी
लदे रहते हैं हमारे कन्धों पर बेताल की तरह
तुमने कहाँ देखे हैं हमारे घाव
घाव के अन्दर रेंगते हुए कीड़े

सारे दुःख हमने झेले हैं
कष्टों को फूल
परेशानियों को धूल समझा है इसके लिए
जीवन को जीवन नहीं पानी समझा था और
पानी की तरह खर्च किया था तुम्हारे लिए

पानी पानी-पानी
हाय पानी
पानी ने छीन ली जिंदगानी
हाय पानी
 'कोटा' का पानी
 'जनरल' वाले तो मरेंगे बिना दाना-पानी कहनेवाले
अपने दर्द को नहीं
अपनी कमजोरियों को ढकने का
एक आसान-सा पत्थर उछालते है आसमान की तरफ
अधजल गगरी छलकत जाए की तरह ।

5)

हमारी इच्छाओं के जंगल में
हमने भटका दिए अपने अकबरो को
दरअसल हमने सम्मान और रुआब के चक्कर में
चुकाए है जीवन

क्या करते?
हम अपनी जिल्लत को भूल नहीं पा रहे थे
देख नहीं पा रहे थे
आबादी और नौकरी का औसत
'सर्वाइवल ऑफ़ दि फिटेस्ट' को मंत्र की तरह पढ़ाते
भूल गए थे
हारनेवाले को मरना भी पड़ता है

सबके लिए नहीं
अपने लिए जीवन की तमाम सुविधाओं की मांग ने
बनाया हैं हमें
हत्यारा डकैत और लूटेरा

हम समाज को लूटते हैं
लूटते हैं देश के भविष्य को
अपने बच्चे की ज़िन्दगी लूटते हुए
शर्मशार होते हैं हम

हम कोटा नहीं बनाते
तृतीय विश्वयुद्ध के लिए हथियार बनाते हैं।