भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कोट नवै पर्वत नवै सिर नवाये न आवै / बुन्देली

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सखि सच कहौ ऐसे न देखे सुने सखि सच कहौ।
श्यामले सलोने किसोर सखि सच कहौ।
माथे पै मोर मुकुट जरकस जराउ पाग नैनन में कज्ज गरे मोतिन की माल।
कानन में कुण्ड पहिरें जड़े हैं लाल प्रभु दीन के दयाल सबको राखत ख्याल।
सखि सच कहौ...
चंदन की खौर टिपकी लाल है गुलाल पान खायें अतरदान अतरदान की बहार
हाथन में कंगन पहिरें मुदरी है लाल प्रभु दीन के दयाल सबके राखत ख्याल।
कैसरिया बागौ पै फेंटा है लाल पीताम्बर धोती की नीली किनार
पाँवन में तोड़ा पहिरें माहुर है लाल प्रभु दीन के दयाल सबको राखत ख्याल।
इक सखि कहै धनुष जेई जो तोड़े एक सखि कहै सिया जेई जो ब्याहैं
खीर खायें पुत्र होय दशरथ के लाल प्रभु दीन दयाल सबको राखत ख्याल।
सखि सच कहौ...
चारउ भैया अनूप जिन्हें देखन आये मदन भूप श्यामले सलोने रूप
सखि सच कहौ...