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कोना सुनाबु हाल बिरह के / नीतीश कर्ण

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कोना सुनाबु हाल बिरह के नोर आँखि में आबईये
करेज मे एकटा टीस उठल आ प्राण ठोर तक आबईये
जानि कोन अपराध केलहु हम, जेकर सजा देलहु आहां हमरा
जिनगी हमर ओई फूल जाकाँ भेल, जेकर रस चुसलक कोनो भंवरा
निश्चहि घोर अपराध हमर छल, जे हम नेह लगेलहुँ
आब अहु सs बइढ कs सजा देब कि, जिबैत जान लs लेलहुँ
आबि गेल फेर आमक महिना, जखने गाछी में महुआ गमकल
हरियर भेल बेमाय करेजक, सुनबा सs कोयली के कु-कल
नैन बिछेने आइयो बाट पर, पैरा अहिं के तकैत छी
मन पता नै कतs लटकल अछि, नै सुतई छी नै जागई छी
ओहि अतीत मे तकबा के, हम अखनेहु इच्छा रखने छी
मुदा देह हमर सिहरी उठइये, जखन गप्प आहा के करैत छी
किछु बुईझ नै आबि पडेयै एहन कोन जुलुम हम केलहुँ
सभहे किछु गेल हराए, किया हम प्रीत लगेलहुँ