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कौन हैं ये स्त्रियाँ / अंकिता जैन

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स्त्रियाँ,
जो पढ़ना चाहती हैं राजनीति
और अर्थशास्त्र भी
मगर सिमट जाती हैं
सुशील मसालों से पेट,
सुंदर आलेपों से तन,
और सभ्य आचरण से घरों को भरने की किताबों में,
स्त्रियाँ,
जो बनना चाहती हैं सोलो-ट्रैवलर
या महज़ टूरिस्ट भी
मगर सिमट जाती हैं
सासरे से मायके तक की रेल में
और छुट्टियों में, जो मिलती हैं
बतौर रिश्तेदारों या फैमिली वेकेशन्स के नाम पर,
स्त्रियाँ,
जो बोलना चाहती हैं
हर मज़हबी-ग़ैर मज़हबी लड़ाई,
और दंगे-फसादों पर भी
उठाना चाहती हैं सवाल संस्कारों और धर्म ग्रंथों पर,
मगर सिमट जाती हैं
छठ, करवाचौथ और वट वृक्षों से लिपटी लाल डोरियों में,
स्त्रियाँ,
जो लेना चाहती हैं अवकाश
सिर्फ सोचने, समझने और लिखने के लिए
जीना चाहती हैं उस एकांत को
जिसे महज़ पढ़ती हैं काल्पनिक किताबों में,
मगर सिमट जाती हैं,
माहवारी की छुआ-छूत
पूजाघर और रसोई की देहरी
कमरे में पति से अलग बिस्तर
और बर्तनों पर लपेटी जा रही राख तक,
स्त्रियाँ,
जो मिटाना चाहती हैं
अपने माथे पर लिखी मूर्खता,
किताबों में उनके नाम दर्ज चुटकुलों,
और इस चलन को भी जो कहता है,
"यह तुम्हारे मतलब की बात नहीं"
मगर सिमट जाती हैं
मिटाने में
कपड़ों पर लगे दाग,
चेहरों पर लगे दाग,
और चुनरी में लगे दागों को,
स्त्रियाँ,
जो होना चाहती हैं खड़ी
चौपालों, पान ठेलों और चाय की गुमटियों पर
करना चाहती हैं बहसें
और निकालना चाहती हैं निष्कर्ष
मगर सिमट जाती हैं
निकालने में
लाली-लिपस्टिक-कपड़ों और ज़ेवरों के दोष,
कौन हैं ये स्त्रियाँ?
क्या ये सदियों से ऐसी ही थीं?
या बना दी गईं?
अगर बना दी गईं तो बदलेंगी कैसे?
बदलेंगी... मगर सिर्फ तब
जब वे ख़ुद चाहेंगी बदलना
सिमटना छोड़कर।