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कौशल्या / दूसरोॅ खण्ड / विद्या रानी

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पुत्र मिलला के दस बरस बाद,
अयलै विश्वामित्र राजा के पास ।
राम लक्ष्मण दुनु केॅ मांगलकोॅ,
डर कुछु नै छै बात कहलकोॅ ।

दशरथ भेजलकोॅ डरलोॅ मोॅन,
कौशल्या डरली छैली मने मन ।
जखनी विशिष्ठ विश्वामित्रा कहलकै,
दशरथ भी कुछु कहेॅ नै पारलकै ।

कौशल्या सें के पूछतियै,
तोरोॅ सुत लै जइयै कि नै ।
हिरदय फाड़ि रोवै कौशल्या,
दुख के जीवन शुरु होय गेलै ।

औन्हों कुछ की करै पारतियै,
गुरु सिनी के बात उठैतियै
राजा नें जबे आज्ञा मानलकै ।
रानी की करी केॅ हठ ठानतिये।

राजधरम तेॅ यहेॅ छेलै न,
राजा जे कहतियै करना ही छेलै।
राजाज्ञा के नै माने के,
केकरोॅ मंें दम कहाँ छेलै।

फिरू कौशल्या तेॅ छेली,
धीर गंभीर आरू प्रशांत ।
राजा के अनुकूल चलै में ।
कहियो तेॅ नै होली भ्रांत।

राम लक्ष्मण दुनु जंगल गेलोॅ,
सुमित्रा के शत्राुघ्न रहलोॅ।
भरत आपनोॅ माय के पास,
असकरी कौशल्या रहली उदास।

कोयल कुहकै जेना बाग में,
माता कुहकै आपनोॅ महलोॅ में।
कुछु नै भावै खाना पीना,
पुत्रा वियोग ही छेलै सहना।

जेना करी केॅ विधि राखै,
दोनों पूत केॅ रक्षा करै।
संजोग के केॅ काटेॅ पारै,
वियोग सहै के शक्ति दै।

जिनगी होलै जल बिनु मछरी,
मरै न जियेॅ छटपट करै।
पिता परमेश्वर के रक्षा लेॅ,
परम ब्रह्म सें ही विनती करै।

हमरोॅ तेॅ जिनगी इहाँ,
आर्त प्रार्थना सें भरलोॅ छै।
निपुतर रहलियै कत्तेॅ दिन,
मिललै छै तेॅ वन गेलोॅ छै।

बड़ा कठिन छै इ जग में,
महान पूत के माय बनना।
पूत के रक्षा में घुलतें रहना,
तलवारोॅ के धार पर चलना।

रहली चुपचाप राम के माय,
दर्शक बनली जे होय जाय।
कुलदेवी कुलदेवता मनावै,
रक्षा करिहौ राम के जाय।

जखनी सुनलकोॅ राम के माय,
राम राक्षसोॅ केॅ मारलकोॅ जाय।
तखनी मोॅन हरसित हो लेॅ,
वात्सल्य भाव तेॅ तिरपित होलै।

परम शक्ति संपन्न राम छै,
सभै जगह विजय होलोॅ छै।
मतरकि माता के हिरदय केॅ,
की कहौं, कैन्हें दहलेॅ छै।

राक्षस मारि अहिल्या तारी,
जनकपुरी पहुँचलोॅ राम।
धनुष तोड़ी सीता पैलकोॅ,
मिथिला केॅ सुरधाम वनैलकोॅ।

शुभ विवाह के संवाद जे अयलोॅ,
नर-नारी सब सुनी सुख पैलकोॅ।
सुखोॅ सें भरि गेलै सब रानी,
जानबे करै छै सभै कहानी।

शुभ संवाद अइतेॅ ही,
तैयारी करेॅ लागली कौशल्या।
चारो भाय के सगुनोॅ लेॅ,
दान पुन्न करेॅ लागली कौशल्या।

शुभ दिन शुभ लगन वाँचि केॅ,
चारो भाय केरोॅ बियाह होलोॅ।
दशरथ के चारो पूत रं ही,
चारो बहू इक्कठे अयलोॅ।

राम के सीता, भरतो के मांडवी,
श्रुति कीर्ति होली शत्राुघ्न के साथ।
उर्मिला केॅ मिललोॅ लक्ष्मण,
पीरो होलै चारो के हाथ।

विश्वामित्रा संग दुनु भाय जे गेलै,
ऊ दुख राजा रानी भुलि गेलै।
सोचेॅ लागलै मनेमन राजा,
जे होलै से अच्छे होय गेलै।

चारो भाय चार बहू आनलकोॅ,
राजमहल में सुख साज सजैलकोॅ।
सभै बहू केरोॅ सुआगत में,
तीनों रानी अति हुलसित होलोॅ।

बहू स्वागत लेॅ छेलै तैयार,
महल, नौकर, चाकर लोग अपार।
आरती करी महल में आनलकोॅ
गीत, नाद ढोल मंजीर बजवैलकोॅ ।

देखी सीता के दिव्य रूप,
गदगद हृदय होय गेली कौशल्या ।
इ सुन्नर मूर्ति रंग कनियाँ,
बनी गेली अयोध्या के रानियाँ ।

जे दिन केरोॅ कल्पना करै छै,
नर-नारी पुत्रा जनम के साथ ।
ऊ दिन आवि गेलै महल में,
हरषित छेली सभै मात ।

काल कतना तेजी से जाय,
अभी जनमलोॅ छेलै सभै भाय ।
अभिये विवाह जोग होय गेलै,
जनकोॅ के कन्या लेॅ आनलकै ।

सभै के मन पूरा होलोॅ छेलै,
चारो भाय चारो बधू रानियाँ ।
महल भर में गूँजे लागलै,
रुनझुन रुनझुन पाँव पैजनियाँ ।