भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

कौशल्या / बारहमोॅ खण्ड / विद्या रानी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तिलतिल करी केॅ दिन काटलकै,
चैदह बरस चैदह जुग रंग बितैलकै ।
धड़धड़ मन घबड़ैलोॅ रहलै,
सभै दिन शंका में बितलै ।

कानै कौशल्या कानै भवन,
आवि गेलै रितुराज वसंत ।
फुललै फरलै उपवन वन,
याद आवै छेलै राम के बचपन ।

पीरोॅ कपड़ा पीरोॅ फूल,
राम लगाय छेलोॅ पीरोॅ चंदन ।
रितु पूजा में चारों भाय,
दमकै छेलै दशरथ नंदन ।

चुनि-चुनि केॅ फूल आने छेलै,
तरह-तरह सें सजाय दै छेले ।
एत्तेॅ सुन्नर बाग बगीचा,
राम सब गाछोॅ के पहचानै छेलै ।

होली खेलबोॅ धूम मचैबोॅ,
राजमहल तेॅ रंगि-रंगि जाय छेलै ।
विविध पकवान आरू व्यंजन,
चारों भाय तेॅ खुव्वे खाय छेलै ।

रंग गुलाल परस्पर डारि,
महलोॅ में धूम मचावे छेलै ।
हरसिंगार के केसरिया रंग,
ओकरा तेॅ खूव्वे भाय छेलै ।

देखोॅ सुमित्रा आज हरसिंगार,
झर, झर, झर, झर नीचेॅ गिरलोॅ छै ।
राम बिना कोय नै देखै छै,
गाछी के नीचे पथार सुखलोॅ छै ।

वैन्हें हरसिंगार फूलों रंग,
रामलखन सिय वन में छै ।
काँटो भरलोॅ झाड़ आरू झांखर,
हुनका सिनी के मग में छै ।

वसंत तेॅ वहुँ अयलोॅ होतै,
राम देखि सुख पैइने होतै ।
औचके ओकरा वन में देखी केॅ,
अचरज सें भरि गेलोॅ होतै ।

सुन्दर तन आरू कोमल मन,
राम कैन्हें भटके वने वन ।
वसंतोॅ के याद आवि रहलोॅ होतै,
राम के संग इ राजभवन ।

कोय रितु आवेॅ तेॅ की होतै,
मन दुखी छै तेॅ सब दुख देतै ।
वसंत ग्रीष्म वरखा हेमंत,
आपने क्रम सें अइवे करतै ।

हे सुमित्रा ग्रीष्म रितु में,
थर, थर, थर मन काँपै छै ।
सूरज गरमाय केॅ ताकै छै,
गरम हवा तेॅ हाँकै छै ।

धरती धिपी के तपतेॅ होतै,
खाली गोड़ फोका ने होय जाय ।
बच्चा सिनी वहाँ भटके छीकै,
भवनों में बैठली निठल्ली माय ।

हे सूरज तनि कोमल बनी ताकी हौ,
हे धरणी तोहें कम गरमै इहोॅ ।
हे पवन कलेॅ कलेॅ चलिहौ,
रामलखन सिय नै तड़पैहौ ।

संध्या समय तीनों वनवासी,
पत्ता के बिछौना डसाय केॅ ।
सुततै गाछीतर या कुटिया में,
निशाचर सिनी सें डराय डराय केॅ ।

कलेॅ-कलेॅ भूमि ठंडैतै,
तपलोॅ धरणी सें मुक्ति पैते ।
तवेॅ पवन तोहें चलतें रहियोॅ,
हमरो सुत के सुख दीहो ।

गरम भूमि गरम बतास,
नय करै सीता केॅ हताश।
जखनी वन गमन ठानलकै,
तखनी दुखोॅ के न्योता देलकै।

हिरदय में जेकरा राखलियै,
गरमी मं पनही पिन्हैलियै।
धूप बतास सें बचावे लेॅ,
महलोॅ में बाँधि केॅ राखलियै।

राजा भी धड़फड़ाय जाय छेलै,
तनटा जे ओकरा नै देखे छेलै।
जल्दी सें बोलाय केॅ आनौ,
गरमी सें बचाय केॅ आनौ।

वही राम धूप ताप सहै छै,
परिजन सब संताप सहै छै।
गरमी सें व्याकुल छै संसार,
ओकरा ला दुख होय छै अपार।

आँखि सें झर झर लोर झड़ै छै,
सावन भादोॅ के बूँद पड़ै छै।
बरखा रितु तेॅ आरू दुख देतै,
भींगी, तीती रामलखन केना रहतै।

पर्णकुटिया जे बनलोॅ होतै,
पता नै केना थमलोॅ होतै।
जौं चूतै तेॅ केना केॅ रहतै,
रामलखन सिय तिततेॅ होतै।

सीता न तेॅ दिव्य वस्त्रा पैनै छै,
तीतलोॅ पर उ सुखि जइतै।
रामलखन के तीतलोॅ वल्कल,
केना करि सुखैते होतै।

जटाजूट सें भरलोॅ माथा,
तितलोॅ पर कत्ता देरी सें सुखतै।
इ वर्षा रितु में भगवान,
ओकरा सिनी केॅ सर्दी होय जइतै।

बालक राम जखनी खेलै छेलै,
बरखा के बूँद लै केॅ हाथ।
सुन्दर मुख दुधिया दाँत देखी,
दिव्य सुख पाय देलै सब मात।

महलोॅ में झूला झूली झूली,
सभै मिली खेलै छेलै।
बरखा रितु कत्तेॅ आनंद दै छै,
यही सभै सोचै छेलै ।

आज बरखा देखि देखि केॅ,
मन डेराय थर थर काँपै छै।
कारोॅ कारोॅ मेघ जे गरजे छै,
वनोॅ में राम केना झाँपे छै।

ठन ठन ठन ठन ठनका ठनकै छै,
कहूँ न कहूँ बिजली गिरै छै।
आग लगी जाय छै वन में,
जीव जन्तु सब भागी पारै छै।

ओहनो जै होतै राम केना रहतै,
यही सोच मारले जाय छै।
बुतरू वन में भाय भवन में,
इ कैन्हें कठजीव भाय छै।

बरखा तेॅ कैन्हों कटि जेतै,
होतै की शिशिर जबेॅ अइतै।
बिना गरम कपड़ा के रामलखन,
जाड़ा सें केना पार पैतै।

दिन भर तेॅ कैन्हों कटि जइतै,
सूरज ताप सें सुख पैइतै।
राति केना केॅ कटतै हो राम,
केना करतै गरमावे के काम।

जौ आगिन जराय के राखतै,
केना बिछौना बचाय के राखतै।
पत्ता के बिछौना में आगिन नै लगे।
एकरा लेॅ के समझाय के राखतै ।

कहोॅ सुमित्रा तोहें सुमंत सें,
राम के पाती पहुँचाय दै जाय ।
होशियारी सें आग जरैतै,
हुनका तौं लिखवाय दौ जाय ।

महलोॅ में सब सुविधा में छी,
तइयो ठाड़ सें हाड़ काँपै छै ।
वनोॅ में रामलखन सिय तीनों,
केना करि केॅ आग तापै छै ।

सर सर सर सर हवा चलै छै,
थर थर काँपै छे हमरोॅ मन ।
इ जाड़ा में हमरोॅ बच्चा सिनी,
वन में छै, कानै छै भवन ।

भवन केना भाँय भाँय करै छै,
एक्के राम बिना बियावन बनी गेलै ।
ठीकै कहै छै घोॅर तेॅ होय छै,
धन सें ज्यादा जन रहला सें ।

काँपी काँपी कुहकै कौशल्या,
सुमित्रा सें सब कहेॅ कौशल्या ।
सुमित्रा कुछु नै कहै पारै छेलै,
मौन समर्थन दै केॅ रहै छेलै ।

जखनी राम वन चललोॅ गेलै,
इ तेॅ दीदी निचिते छेलै ।
सब रितु आरू सब त्योहार में,
ओकरा सिनी याद अइवे करतै ।

तन छौं इहाँ मन रामोॅ के पास,
सौंसे अयोध्या छिके उदास ।
साँपों के मणी जेना गेलै भुलाय,
मछरी जाल सें निकालली जाय ।

दिन दिन गिनै रितु रितु निरखै,
कौशल्या तिल तिल दिन काटै ।
हृदय मं धीर धरी सुमित्रा सें,
आपनोॅ सबटा दुख छेलै बाँटे ।

जखनी विराध वध के खबर अइलै,
दुखोॅ में सुख के किरण मिललै ।
बच्चो में तेॅ मारवे करने छै,
राक्षस सनि के, कानि केॅ कहलकै ।

रामलखन के वीरता में,
कुछु संदेह तेॅ नहिये छै ।
तइयो मोन डरलोॅ रहै छै,
वन तेॅ आखिर वने नी छै ।