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क्या जाग जायेंगे लोग? / प्रताप सहगल
Kavita Kosh से
लोग सो गए हैं
मैं जांच रहा हूं एक लड़की का भविष्य
लोग सो गये हैं
मैं ले रहा हूं नोट्स
सो गए हैं लोग
मैं पढ़ रहा हूं नेपोलियन का इतिहास
लोग सो गए हैं
मैं देख रहा हूं हिटलर के बनाए
कंटीले और जानलेवा करावास
ढूंढ रहा हूं रूस, जर्मनी
और हालैण्ड में
यहूदियों की सड़ती लाशें
सोये हैं लोग
मैं पहचान रहा हूं
ब्रह्मपुत्र घाटी के सीने में ठुके
नोकदार हाथ
वाकई सो गए हैं लोग
मैं कर रहा हूं षड्यंत्र
लिख रहा हूं कविता
कविता सुनाऊंगा जब
तब
क्या जाग जायेंगे लोग?
1981