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क्या पौरुष सिर्फ़ छलना भर है / रंजना जायसवाल

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तुम जानते थे
स्त्री के भीतर रहती है
नन्ही, मासूम, भोली चिड़िया।
भरम जाती है
जादुई बातों से
परचा सकते हैं जिसे
रोज़-रोज़ बिखेरे गये
प्यार के दानें।
जानते थे तुम
सशंकित रहती है प्रलोभनों से
चिड़िया
भरम जाती है अन्ततः।
जानते थे
आसान होगा
पंख खोलती चिड़िया को पा लेना
और बहुत ही आसान होगा
पंख मरोड़कर चल देना
क्या पौरूष
सिर्फ छलना भर है?