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क्षुब्ध कालो अँध्यारो / बद्रीप्रसाद बढू

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त्यो बेलाका सवल पिंजडा भित्रका लेखनाथ
तिम्रा पंक्षी घर घर अझै बन्द छन् रे ! अनाथ
खोज्दा खोज्दै नयन तिनका सभ्यताको दियालो !
देख्छन् खाली वरिपरि कठै ! क्षुब्ध कालो अँध्यारो !!