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खंडहर-दर-खंडहर / दीप्ति गुप्ता

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ऐतिहासिक स्मारक दुनिया के
अचरज से तकते हम उनको
महल-दुमहलों और खम्भों को
सूने आंगन और जंगलों को
खंडहर बनी दीवारे कहती
रीत गई शानो-शौकत को...
ऐसे ही ये काया भी तो
एक 'जीवन-स्मारक’ है
काया के खंडहर के अंदर
दिल का खंडहर हिला हुआ है
जगह-जगह दरारे इसमें
फिर भी देखो, बना हुआ है!
ये काया नन्ही सी थी जब
तब से इसके साथ बनी हूँ
पल-पल इसके संग जीती हूँ!
अजब-गजब ऋतुओ से गुज़री
तपते एहसासों से झुलसी
नेह से अपनों के, मैं भीगी
बासंती सरसों सी महकी,
तभी चल पड़ी सांय-सांय
दुःख- दर्दों की तेज़ हवाएँ.
सहम-सहम के उनको झेला
भरी थी सन्नाटे से काया
घबराई तूफानों से
उतर गई सोपानों से
दी शरण तुरत
इसी काया ने
मन्त्र दिया किसी छाया ने -
जीना हरदम जीवट से
खेते जाना केवट से
मत रहना तुम बेबस से!
मन्त्र दबाएँ होठो में
बढ़ती गई मैं चोटों में...
गुजर चुका था काला मंज़र
जीर्ण-शीर्ण लगता था पिंजर
समय लिख रहा था इस काया पे
तिथि सहित इतिहास पलों का,
हर दिन, हर माह और वर्षों का
सब कुछ वैसा नहीं रहा अब
चलती-फिरती अब ये काया
है संजोये मोह औ माया
माँ, बच्चे और साथी-संगी
कभी न ये मन, भूल है पाया
शैशव से अब तक की सारी
ऐतिहासिक यादे हैं तारी
जब-जब देखूँ जर्जर होते
काया के इस खंडहर को
हर्षा - मुरझा जाती हूँ
पर...,
बेशकीमती इस खंडहर में
सुकून बड़ा मैं पाती हूँ!