भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

खंड-10 / पढ़ें प्रतिदिन कुण्डलियाँ / बाबा बैद्यनाथ झा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

कैसे मानव योनि में, प्राप्त करें आनन्द।
यह कहने थे अवतरित, हुए विवेकानन्द।।
हुए विवेकानन्द, श्रेष्ठतम धर्म सनातन।
पाएँ हम पुरुषार्थ, जगत से रख अपनापन।।
रहें सदा निर्लिप्त, कमलदल पर जल जैसे।
कर सांसारिक भोग, परमपद पाएँ कैसे।।
 
रोता पर्वत कर रहा, प्रभु से करुण पुकार।
होगा अब अति शीघ्र ही, धरती का संहार।।
धरती का संहार, बचाएँ हम अब कैसे।
जब नर ही अस्तित्व, खत्म कर चाहे पैसे।।
उपजा है अज्ञान, स्वार्थ में लगता गोता।
संरक्षण बिनु पेड़, सहित पर्वत भी रोता।।

सैनिक करते देश हित, प्राणों का उत्सर्ग।
भारत जिससे बन सके, इस धरती का स्वर्ग।।
इस धरती का स्वर्ग, बर्फ में पहरा करते।
सम्मुख हो जब काल, नहीं वह किञ्चित् डरते।।
एकमात्र है लक्ष्य, सुरक्षा करना दैनिक।
सोते हम निश्चिन्त, जागते रहते सैनिक।।
 
सोते उठते जागते, लेता माँ का नाम।
बने स्वतः फिर नित्य ही, मेरे बिगड़े काम।।
मेरे बिगड़े काम, नहीं मैं माँ को भूलूँ।
होता है आभास, गोद में माँ की झूलूँ।।
नहीं चाहती मातु, पुत्र को देखे रोते।
रखे सर्वदा ध्यान, रात में जब हम सोते।।
 
माता है जगदम्बिके, सरस्वती का रूप।
काली या बगलामुखी, सारे रूप अनूप।।
सारे रूप अनूप, पुत्र की रक्षा करती।
मातृभक्त हो पुत्र, सकल दुख माँ है हरती।
जग में मातु समान, नहीं कोई भयत्राता।
देकर भी निज प्राण, बचाती सबको माता।।
 
होता अगर उदास मन, ढूँढें श्रेष्ठ विकल्प।
करें इष्ट का ध्यान पुनि, रखकर दृढ़ संकल्प।।
रखकर दृढ़ संकल्प, कर्म में हम जुट जाएँ।
आए कुछ व्यवधान, नहीं कथमपि घबड़ाएँ।।
पा लेता वह लक्ष्य, कभी जो धैर्य न खोता।
प्राप्त करें उपलब्धि, अशुभ जब भी है होता।।
 
हे नारी तुम धन्य हो, ममता का प्रतिरूप।
माँ पत्नी बेटी बहन, सारे रूप अनूप।।
सारे रूप अनूप, तुम्हीं पर सृष्टि टिकी है।
दुनिया तेरे पास, सदा हो नम्र झुकी है।
कह “बाबा” कविराय, नहीं अब हो बेचारी।
सचमुच हो वरदान, धरा पर तुम हे नारी।।
 
करते हैं जब श्रेष्ठजन, इस जग से प्रस्थान।
देकर जाते जगत को, वे अमूल्य अवदान।
वे अमूल्य अवदान, नामवर वे हो जाते।
रच देते इतिहास, अमर पद जग में पाते।।
जग में लेकर जन्म, जीव तो प्रतिदिन मरते।
सारे उत्तम काम, श्रेष्ठजन हरदम करते।।
 
नारी के अस्तित्व को, समझ सकेगा कौन।
 हो रहस्यमय बोल भी, उससे बढ़कर मौन।।
उससे बढ़कर मौन, हृदय में क्या रखती है।
देती है संकेत, नहीं मुँह से कहती है।।
कहता है इतिहास, सृष्टि ही उससे हारी।
यह सुन्दरतम सृष्टि, सदा होती है नारी।।
 
नारी बेचे जिस्म जो, नर बेचे ईमान।
मैं कहता हूँ ठाठ से, दोनों एक समान।।
दोनों एक समान, आप ही फर्क बताएँ।
क्या दोनों में भेद, श्रेष्ठतम तर्क बताएँ।।
बने बिकाऊ माल, बचाना इनको भारी।
दोनों हैं लाचार, बिकाऊ नर या नारी।।