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खंड-16 / बाबा की कुण्डलियाँ / बाबा बैद्यनाथ झा

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साजन भी सुनता कहाँ, सजनी के दुखदर्द।
बोलो होता है कहीं, निर्मम इतना मर्द।।
निर्मम इतना मर्द, प्रिया से स्नेह बढ़ाए।
सदा रहे साकांक्ष, दुखों को दूर भगाए।
कह ‘बाबा’ कविराय, प्यार से हो संभाषण।
बाँटे सुखदुख साथ, वही है सच्चा साजन।।

चलती है मादक हवा, मन रहता बेचैन।
चंचल मन क्यों भटकता, व्याकुल है दिनरैन।।
व्याकुल है दिनरैन, चित्त सर्वत्र भटकता।
आया है मधुमास, दिव्य सौंदर्य झलकता।
कह ‘बाबा’ कविराय, कामना मोहक पलती।
नहीं किसी का दोष, हवा ही ऐसी चलती।।

लगता है अब आ रहा, सबका प्रिय मधुमास।
सबके मन जगने लगी, पिया मिलन की आस।।
पिया मिलन की आस, उसे मैं पाऊँ कैसे।
दिल तो है बेचैन, कूदकर जाऊँ कैसे।
कह ‘बाबा’ कविराय, भाव क्यों ऐसा जगता।
मिला नहीं अवकाश, भयावह जाना लगता।।

जीवन भर मैंने किया, जिससे दर्द बयान।
उसके दिल के साथ थे, बहरे दोनों कान।।
बहरे दोनों कान, बहुत थी उससे आशा।
अब मैं जाना सत्य, मिली जब मात्र निराशा।
कह ‘बाबा’ कविराय, व्यर्थ ही बीता यौवन।
अब मैं हूँ बेकार, निरर्थक मेरा जीवन।।

मेरी है यह लालसा, लिखूँ श्रेष्ठ ही छंद।
पर संभव दिखता नहीं, मैं तो हूँ मतिमंद।।
मैं तो हूँ मतिमंद, श्रेष्ठता कैसे पाऊँ।
प्रभु से पाकर शक्ति, वचन बेफिक्र निभाऊँ।
कह ‘बाबा’ कविराय, कृपा जब होगी तेरी।
कर दो प्रभु दे ध्यान, मनोरथ पूरी मेरी।।

नश्वर है तन जानकर, करो सदा शुभ काम।
कीर्ति पताका ले सदा, यह जग लेगा नाम।।
यह जग लेगा नाम, दिव्य दृष्टान्त बनोगे।
पीछे लोग हजार, सदा ले साथ चलोगे।
कह ‘बाबा’ कविराय, करे सब कुछ परमेश्वर।
धर लो उनका संग, शेष जग ही है नश्वर।।

जिसका हृदय पवित्र हो, और रखे सम भाव।
वह बोले तो अन्य पर, पड़ता तुरत प्रभाव।।
पड़ता तुरत प्रभाव, हृदय जब निश्छल होता।
आकर्षण में बद्ध, मुग्ध होते हैं श्रोता।
कह ‘बाबा’ कविराय, नहीं हो दुश्मन उसका।
बन जाते सब मित्र, रहे मन निर्मल जिसका।।

कवि के मानस-गर्भ से, कविता की हो सृष्टि।
निकली कविता कामिनी, करे प्रेम की वृष्टि।।
करे प्रेम की वृष्टि, प्रसव-सा दर्द दिलाती।
लेकर मृदु मुस्कान, धरा पर वह है आती।
कह ‘बाबा’ कविराय, चूर मद में वह छवि के।
फिर तो अति सम्मान, बढ़ाती हरदम कवि के।।

छोड़ा था दुख में मुझे, उसका शुक्रगुजार।
बिन उसके मैंने किया, निज दुख का निस्तार।।
निज दुख का निस्तार, गजब का साहस पाया।
खुद करके संघर्ष, दुखों को खूब छकाया।
कह ‘बाबा’ कविराय, बना मैं रण का घोड़ा।
उसका हो कल्याण, भँवर में जिसने छोड़ा।।

जब भी अच्छे कार्य में, लोग करे व्यवधान।
दें कुत्तों को भौंकने, नहीं दीजिए ध्यान।।
नहीं दीजिए ध्यान, कार्य में जोर लगा दें।
सुनते रहिए व्यंग्य, सहन की शक्ति बढ़ा दें।
कह ‘बाबा’ कविराय, टोक वे देंगे तब भी।
आदत से लाचार, दुष्ट मिल जाए जब भी।।