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खंड-1 / बाबा की कुण्डलियाँ / बाबा बैद्यनाथ झा

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जितना पाया आपसे, बाँट सकूँ सद्ज्ञान।
मातु शारदे कर कृपा, कभी न हो अभिमान।।
कभी न हो अभिमान, सदा मैं विद्या बाँटूँ।
जग का हो कल्याण, भले अपने दुख काटूँ।
कह ‘बाबा’ कविराय, बढ़े विद्याधन उतना।
कर लूँ विद्या दान, बढ़ेगा बाँटूँ जितना।।

माता वीणा-धारिणी, दूर करो अज्ञान।
पाऊँ निज पाण्डित्य से, पूर्ण जगत में मान।।
पूर्ण जगत में मान, बढ़ाकर निज गरिमा को।
बढ़े वंश का मान, सुनाबे जग महिमा को।
कह ‘बाबा’ कविराय, तुम्हीं केवल भयत्राता।
मिले ज्ञान की भीख, सदा सरस्वती माता।।

कुण्डलियाँ होतीं सदा, सचमुच ही बेजोड़।
कहता हूँ मैं ठाठ से, मिले न इनका तोड़।।
मिले न इनका तोड़, सदा ये सबकुछ कहतीं।
देखेंगी अन्याय, कहेंगी सहन न करतीं।
कह ‘बाबा’ कविराय, छिटकती हैं फुलझड़ियाँ।
होता हृदय प्रसन्न, पढ़ूँ जब भी कुण्डलियाँ।।

सेवा में जबतक रहा, नहीं पड़ा बीमार।
पर उसके कुछ बाद ही, गया ज़िन्दगी हार।।
गया ज़िन्दगी हार, जी रहा अब शव बनकर।
हुआ जो पक्षाघात, न उठ पाता हूँ तनकर।
कह ‘बाबा’ कविराय, न खा सकता अब मेवा।
सकल जगत को भूल, अब बची प्रभु की सेवा।।

जिसके संचित पुण्य से, बेटी दे भगवान
उसके आदर मात्र से, बढ़ जाता सम्मान
बढ़ जाता सम्मान, वही फिर आगे पढ़कर
करती अगणित कार्य, सदा देखें बढ़-चढ़कर
कह ‘बाबा’ कविराय, भाग्य जब बदले उसके
एक वही धनवान, हो घर बेटियाँ जिसके।

होली आयी इसलिए, हमसब झूमें आज।
वैरभाव सब भूलकर, पुलकित सकल समाज।।
पुलकित सकल समाज, खुशी में सब हैं गाते।
नया-नया पकवान, बनाकर खूब खिलाते।
कह ‘बाबा’ कविराय, उठा अबीर की झोली।
बाँटें संग उमंग, सरस बन जाए होली।।

राधा रानी खेलती, वृन्दावन में फाग।
बनी कृष्णमय आज वह, बाँट रही अनुराग।।
बाँट रही अनुराग, बनी है अनुपम झाँकी।
अंग-अंग में रंग, रह न जाए कुछ बाँकी।
कह ‘बाबा’ कविराय, हरेगी हर इक बाधा।
दौड़े आते कृष्ण, जहाँ होती है राधा।।

कविता लेखन-धर्म में, जो भी हैं निष्णात।
होती है अनमोल ही,उनकी हर इक बात।।
उनकी हर इक बात, अचंभित कर देती है।
अर्थ गूढ़ गंभीर, सजगता भर देती है।
कह ‘बाबा’ कविराय, जहाँ न पहुँचे सविता।
कवि की दृष्टि अचूक, वहाँ जा लिखते कविता।।

अपना-सा था वह लगा, पर खोया विश्वास।
लूट लिया उसने मुझे, रहा न कुछ भी पास।।
रहा न कुछ भी पास, बहुत ही धोखा खाया।
मुस्काता वह देख, सताकर खूब रुलाया।।
कह ‘बाबा’ कविराय, नहीं अब देखूँ सपना।
दुनिया क्षणभंगूर, नहीं है कोई अपना।।

वैसे तो मैं लिख रहा, विविध छंद या गीत।
कुंडलियों से हो गयी, है अतिशय ही प्रीत।।
है अतिशय ही प्रीत, इसी से क्यों है ममता।
लिखना है हर छंद, बढ़ाऊँ अपनी क्षमता।
कह ‘बाबा’ कविराय, बुझाऊँ मन को कैसे।
जैसे उपजे भाव, लिखा जाता है वैसे।।