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खंड-24 / पढ़ें प्रतिदिन कुण्डलियाँ / बाबा बैद्यनाथ झा

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जय जननी माँ भारती, पावन तेरा नाम।
किस विधि मैं सेवा करूँ, आ तेरे काम।
आ तेरे काम, समर्पित है यह जीवन।
रहे समर्पण भाव, बनेगा सार्थक यौवन।।
रहे समुन्नत देश, नहीं हो दुख की रजनी।
तू ही है सर्वोच्च, जपूं मैं जय जय जननी।।
 
पाकर मानव योनि हम, मत भूलें अस्तित्व।
बिना त्याग सम्भव नहीं, द्योतित हो व्यक्तित्व।।
द्योतित हो व्यक्तित्व, सदा करते जो संग्रह।
होता उससे नित्य, स्वजन का प्रतिपल विग्रह।।
खुद से पूछें आप, किया क्या जग में आकर।
करें त्याग अरु दान, योनि मानव की पाकर।।
 
चमगादड़ सब पंच थे, उल्लू था सरपंच।
परम सत्य है क्या बला, निर्णय कर दे मंच।।
निर्णय कर दे मंच, बहस भरपूर चलायी।
अलग-अलग सुन तर्क, हुई अति हाथापाई।
तब बोले सरपंच, सुनें सब भाई सादर।
अन्धकार ही सत्य, परम है हे चमगादड़।।
 
रहते हैं वे देश की, रक्षा को तैयार।
कफन बाँध सर पर चले, सहने को हर वार।।
सहने को हर वार, नहीं वे पीठ दिखाते।
कर अरि का संहार, सबक भी खूब सिखाते।।
हर मौसम की मार, बखूबी हैं वे सहते।
देश उन्हीं को सौंप, सुरक्षित हम सब रहते।।

देता हूँ शुभकामना, रहे समुन्नत देश।
सुखमय हर परिवार हो, मंगलमय परिवेश।
मंगलमय परिवेश, कभी विपदा नहि आवे।
हो अभिलाषा पूर्ण, तृप्ति हर प्राणी पावे।।
सबका हो कल्याण, यही वर प्रभु से लेता।
मैं भी आता काम, देश हित जीवन देता।।

करते रहिए सर्वदा, सर्वांगीण विकास।
मिले खुशी या दुख कभी, मत हों आप उदास।।
मत हों आप उदास, सृष्टि का नियम यही है।
बीते दुख की रात, बात भी पूर्ण सही है।।
जो लेते हैं जन्म, किसी दिन निश्चित मरते।
कालचक्र को देख, नहीं हम सोचा करते।।
 
चलती है सुख की घड़ी, मेरी प्रायः मन्द।
दुख में भी रखकर खुशी, पाता परमानन्द।।
पाता परमानन्द, समझकर प्रभु की माया।
यह मेरा सौभाग्य, प्राप्त है मानव-काया।।
सुख-दुख है प्रारब्ध, शाम भी प्रतिदिन ढलती।
फिर आता शुभ भोर, सृष्टि इस विधि से चलती।।
 
आओ निष्ठुर शीघ्र अब, बीत रही है रात।
तृषित हृदय को चाहिए, प्यार भरी सौगात।।
प्यार भरी सौगात, प्रतीक्षा कब तक होगी?
मिलन पूर्व भी नीन्द, कहो क्या तबतक होगी?
आकर मेरे साथ, शयन का कक्ष सजाओ।
देख रही हूँ बाट, सजन घर जल्दी आओ।।
“भारतरत्न अटल जी की प्रथम पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि!”
 
 
अटल बिहारी हो गये, चिरनिद्रा में लीन।
आता है हर जीव ही, बनकर कालाधीन।।
बनकर कालाधीन, कहो क्या वह मरता है?
जीवन का उत्सर्ग, देशहित जो करता है?
जो करता सत्कर्म, जीतता दुनिया सारी।
पूजे उसको विश्व, बने जो अटल बिहारी।।

आता है जो सर्वदा, मातु-पिता के काम।
उसका मंगल भोर हो, मंगल होती शाम।।
मंगल होती शाम, सदा वह खुश रहता है।
लेकर सब आनन्द, वहाँ सागर बहता है।
वह पाता आशीष, गीत मंगल के गाता।
जो अपना कर्तव्य, निभाने जग में आता।।