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खंड-25 / पढ़ें प्रतिदिन कुण्डलियाँ / बाबा बैद्यनाथ झा

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जिसमें होती विद्वता, उसको रोके कौन?
कस्तूरी की गंध क्या, रह पाती है मौन?
रह पाती है मौन, स्वतः ही सब जानेंगे।
लोग करेंगे खोज, विज्ञता सब मानेंगे।।
प्रतिभा को ले रोक, कहो यह दम है किसमें?
खुद पाता सम्मान, दक्षता होती जिसमें।।

सुख-दुख मिलते अन्य से, भ्रम है यह अनुमान।
सबकी जड़ निज कर्म या, कर्त्तापन अभिमान।।
कर्त्तापन अभिमान, यही प्रारब्ध बनाता।
कभी किसी को रंक, किसी को राज्य दिलाता।।
जब हों अच्छे कर्म, पंक में पंकज खिलते।
उत्तरदायी भाग्य, उसी से सुख-दुख मिलते।।
 
मेरा मन कहता सदा, करो मुक्त आचार।
पर विवेक की दृष्टि से, है यह घृणित विचार।।
है यह घृणित विचार, काम ऐसा मत करना।
पशु का है यह काम, सदा ही मुक्त विचरना।।
बनता तीर्थस्थान, जहाँ संयम का डेरा।
सदा बुद्धि अनुरूप, कर्म हर होता मेरा।।

नव वसन्त में हर्ष है, हर डाली पर फूल।
मलय पवन है बह रहा, मौसम है अनुकूल।।
मौसम है अनुकूल, सजन बिन घर था सूना।
आए प्रियतम पास, मज़ा फिर आया दूना।।
प्रणयकेलि के बाद, नहीं हो जाए चम्पत।
डरती सजनी आज, देखकर यह नव सम्वत।।

 है कुत्सित यह धारणा, या है एक फरेब।
खोज रहा है सन्त में, देखो कैसे ऐब।।
देखो कैसे ऐब, देश को भ्रमित करे वह।
चोर मचाए शोर, नहीं अब ढीठ डरे वह।।
मैं हूँ दर्शक मौन, एक किस्मत का मारा।
बहते सारे लोग, जिधर बहती है धारा।।
 
 मन की शुचिता है नहीं, तन पर किया विचार।
 मन के भीतर मैल है, बाहर है शृंगार।।
बाहर है शृंगार, मगर जब मन है गन्दा।
जाना है परलोक, गले में होगा फन्दा।।
कर लें हृदय पवित्र, पढ़ें “बाबा” की कविता।
क्षणिक बाह्य सौन्दर्य, श्रेष्ठ है मन की शुचिता।।
 
नारी की गति देखिए, है उदास गमगीन।
तड़प रही एकान्त में, ज्यों शीशे में मीन।।
ज्यों शीशे में मीन, दर्द कोई पहचाने।
दोनों एक समान, तड़पना ही बस जाने।।
मर्यादा का बाँध, बना इनकी लाचारी।
सदियों से यह त्रास, झेलती आयी नारी।।

लगता है जग सत्य है, इसको मिथ्या मान।
दृश्य जगत सच दीखता, परम सत्य भगवान।
परम सत्य भगवान, शेष दिखती है माया।
जिस पर है अभिमान, क्षणिक है यह भी काया।।
जागृत सत्य स्वरूप, हमें है हरदम ठगता।
क्षणभंगुर यह विश्व, सत्य सा अपना लगता।।
 
होती जब भगवत्कॄपा, तथा भाग्य अनुकूल।
आँचल में माँ को मिले, सुन्दर पहला फूल।।
सुन्दर पहला फूल, उसे होता अति प्यारा।
पढ़ा-लिखाकर खूब, बनाती राज दुलारा।।
संतति को हो कष्ट, रातदिन रहती रोती।
करती है जो त्याग, वही तो माता होती।।
 
आकर विद्वज्जन यहाँ, सुना गये कुछ छन्द।
अमिट छाप इस हृदय पर, छोड़ गये कवि चन्द।।
छोड़ गये कवि चन्द, मंच सबका आभारी।
धन्यवाद श्रीमान्, करें अग्रिम तैयारी।।
आये सुखमय नीन्द, शयन का कक्ष सजाकर।
किया आपने धन्य, मंच पर कविगण आकर।।