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खंड-28 / पढ़ें प्रतिदिन कुण्डलियाँ / बाबा बैद्यनाथ झा

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मिलता गुरु को भाग्य से, अति विनम्र जब शिष्य।
आह्लादित हो गुरु करे, उसका सुखद भविष्य।।
उसका सुखद भविष्य, सही सन्मार्ग दिखाकर।
उसे बनाते योग्य, ज्ञान का पाठ पढ़ाकर।।
कह “बाबा” कविराय, पंक में पंकज खिलता।
गुरु देते सद्ज्ञान, शिष्य जब वैसा मिलता।।
 
आये लिखकर वृक्ष पर, जो भी रचनाकार।
सबके सुन्दर भाव हैं, सबका है आभार।।
सबका है आभार, लिखें सब खूब निरन्तर।
बना रहे सद्भाव, भाव में हो भी अन्तर।।
सबका हो उद्देश्य, नित्य ही वृक्ष लगाए।
लिखकर सुन्दर छन्द, मंच पर प्रतिदिन आये।।
 
आती है सुख की घड़ी, राही बनकर पास।
यादें रहतीं राह सी, जो है सतत उदास।।
जो है सतत उदास, यही है जीवन-चिन्तन।
सुख टिकता क्षणमात्र, करें हम इसपर मन्थन।।
आता स्वर्णिम भोर, रात्रि जब है ढल जाती।
यह भी है ध्रुव सत्य, घड़ी सुख की भी आती।।

साजन को लिखने लगी, खत में दिल की बात।
कैसे काटूं विरह में, तुम बिन सारी रात।।
तुम बिन सारी रात, अरे निष्ठुर आ जाओ।
दे दूँगी मैं प्राण, अधिक मत अब तरसाओ।।
कह “बाबा” कविराय, रूठ मत जाओ राजन।
सूख गयी है देह, शीघ्र आ देखो साजन।।
  
जीता है जो दम्भ में, समझो है वह हार।
अहंकार जब बढ़ गया, तब होगा संहार।।
तब होगा संहार, अहं है प्रभु का भोजन।
जब होता है नाश, करे वह प्रतिपल रोदन।।
कह “बाबा”कविराय, घूँटअपयश का पीता।
बने घृणा का पात्र, दम्भ पाले जो जीता।।
 
आये हैं मानव बने, करने कुछ व्यापार।
हमसब ग्राहक हैं यहाँ, यह जग है बाजार।
यह जग है बाजार, खरीदें जो भी चाहें।
सही गलत उपलब्ध, बनी हैं दोनों राहें।।
प्रभु ने दी है छूट, व्यक्ति जो भी ले जाए।
सब अपना प्रारब्ध, बनाने जग में आये।।
 
मानव मन है बन रहा, एक घृणित बाजार।
विस्मृत कर कर्त्तव्य निज, करते स्वेच्छाचार।।
करते स्वेच्छाचार, स्वार्थ लोलुप सब होते।
देख क्षणिक व्यवधान, धैर्य सब अपना खोते।।
बने परस्पर शत्रु, कर्म करते ज्यों दानव।
पशुवत् रख व्यवहार, बाहरी दिखते मानव।।
 
देना है इस बात पर, विद्वज्जन को ध्यान।
नहीं मातृभाषा बिना, हो सम्यक् उत्थान।।
हो सम्यक् उत्थान, जन्म से सीखा जिसको।
वह भाषा है श्रेष्ठ, त्याज्य मत मानें उसको।।
होता बहुत महत्व, ज्ञान प्रारम्भिक लेना।
मातृ वचन अनमोल, श्रेय है उसको देना।।

आकर कविगण पढ़ गये, सुन्दर-सुन्दर छन्द।
श्रोतागण मोहित हुए, मुस्काकर वे मन्द।।
मुस्काकर वे मन्द, तालियाँ खूब बजायीं।
हर्षित हो सब लोग, हृदय से दीन्ह बधाई।।
कह “बाबा” कविराय, छन्द पढ़ पाये गाकर।
किया पटल को धन्य, विज्ञजन सस्वरआकर।।

रहते हैं घर में सदा, मेरे तो भगवान।
मातु-पिता का साथ ही, होता तीर्थस्थान।।
होता तीर्थस्थान, करूँ नित उनकी सेवा।
है उनका आशीष, प्राप्त होता नित मेवा।।
रहकर नित्य प्रसन्न, बात वे सुन्दर कहते।
जो कुछ है उपलब्ध, उसी से खुश हम रहते।।