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खंड-2 / बाबा की कुण्डलियाँ / बाबा बैद्यनाथ झा

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जीवन के संग्राम में, नहीं हुआ भयभीत।
नहीं चाहता हार मैं, हरदम चाहूँ जीत।।
हरदम चाहूँ जीत, सदा रहता मुस्काता।
कर्मठता से काम, करूँ मैं हँसता गाता।
कह ‘बाबा’ कविराय, बचा है जबतक यौवन।
उसदिन पूर्ण विराम, अगर थक जाए जीवन।।

जीवन यौवन में छिड़ा, बड़ा भयंकर युद्ध।
यह जीवन संग्राम है, कभी न होवें क्रुद्ध।।
कभी न होवें क्रुद्ध, पछाड़ो उसको मारो।
छिपी हार में जीत, नहीं तुम हिम्मत हारो।
कह ‘बाबा’ कविराय, लगाओगे जब तन-मन।
पाओगे हर वस्तु, सफल होगा तब जीवन।।

खाँसी आये चोर को, दासी रक्खे संत।
अकस्मात् पकड़े गये, फिर दुख भोग अनंत।
फिर दुख भोग अनंत, जहाँ भी पकड़े जाते।
अच्छी पड़ती मार, सभी मिल सबक सिखाते।
कह ‘बाबा’ कविराय, भले चढ़ जाओ फाँसी।
चौर्यकर्म के संग, करे आवाज न खाँसी।।

योगी बनते योग से, करे तपस्या संत।
कर्मयोग करते रहो, खुश होते भगवंत।।
खुश होते भगवंत, समर्पण करना जानो।
योगक्षेम सब कृष्ण, करेंगे निश्चित जानो।
कह ‘बाबा’ कविराय, बनो मत केवल भोगी।
बन जा मात्र निमित्त, बनो फिर असली योगी।।

भाईचारा दो निभा, जितनी हो सामर्थ्य।
तेरा भी होगा भला, है प्रामाणिक तथ्य।।
है प्रामाणिक तथ्य, रखो मत उससे आशा।
होगा अगर कृतघ्न,मिलेगी मात्र निराशा।
कह ‘बाबा’ कविराय, समझ लो है बेचारा।
छोड़ो मत कर्तव्य, निभा दो भाईचारा।।

अपना जब कुछ भी नहीं, जग से फिर क्यों मोह।
यह तो अति सामान्य है, होना मिलन बिछोह।।
होना मिलन बिछोह, जगत का नश्वर नाता।
जाना खाली हाथ, संग बोलो क्या जाता।
कह ‘बाबा’ कविराय, जगत को मानो सपना।
संग रहे निज कर्म, वही है केवल अपना।।

जितना संभव हो करें, हरदम अच्छे कार्य।
आप बनें सबके लिए, अनायास स्वीकार्य।।
अनायास स्वीकार्य, जिधर जाएँ हो पूजा।
लोग करे गुणगान, कहे न आप सम दूजा।
कह ‘बाबा’ कविराय, मिलेगा आदर इतना।
सात जन्म तक पुण्य, फलेगा हरदम जितना।।

जिनसे सीखा है कभी, एक वर्ण का ज्ञान।
रह कृतज्ञ मैं मानता, उनको ब्रह्म समान।।
उनको ब्रह्म समान, समझ मैं आदर करता।
पाकर अक्षर ब्रह्म, निडर हो नित्य विचरता।
कह ‘बाबा’ कविराय, बहुत कुछ सीखा उनसे।
दिल से देता मान, बना हूँ साक्षर जिनसे।।

कह लो जो कहना तुम्हें, अपने मन की बात।
पर ऐसा कुछ मत कहो, जिससे हो आघात।।
जिससे हो आघात, सदा मैं तुमसे डरता।
तुम ही हो सर्वस्व, तुम्हीं पर जीता मरता।
कह ‘बाबा’ कविराय, कभी मेरा भी सह लो।
सुन लो अच्छी बात, प्रिये फिर जो भी कह लो।।

आया पूरे विश्व में, ईसाई नव वर्ष।
मना रहे उत्सव सभी, पाकर अनुपम हर्ष।।
पाकर अनुपम हर्ष, प्रफुल्लित हैं नर-नारी।
नया-नया पकवान, बनाने की तैयारी।
कह ‘बाबा’ कविराय,युवा अतिशय हर्षाया।
चारों ओर उमंग, लिए यह उत्सव आया।।