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खंड-4 / बाबा की कुण्डलियाँ / बाबा बैद्यनाथ झा

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ऐसा क्या मैं कर सकूँ, जिससे पाऊँ चैन।
रोग शोक दुख दैन्य से, दूर रहूँ दिन-रैन।।
दूर रहूँ दिन-रैन, कमाकर खाऊँ सुख से।
सह लूँ भौतिक कष्ट, पर न घबड़ाऊँ दुख से।
कह ‘बाबा’ कविराय, चाहिए अधिक न पैसा।
पल जाए परिवार, प्रभो दिन आए ऐसा।।

भौतिक शिक्षा प्राप्त कर, जी सकते हैं आप।
सिखलाता अध्यात्म ही, आत्म ज्ञान क्या पाप।।
आत्म ज्ञान क्या पाप, इसे ही जिसने जाना।
वही संत विद्वान, जगत को प्रभुमय माना।
कह ‘बाबा’ कविराय, वही सुख होता मौलिक।
शरणागत हों कृष्ण, सदा नश्वर है भौतिक।।

बोलो तो वह क्या करे, जो है मरणासन्न।
एकमात्र प्रभु शरण जा, कर लें आप प्रसन्न।।
कर लें आप प्रसन्न, क्षमा मांगें .फिर उनसे।
पुनः करें मत पाप, कहें तन पाया जिनसे।
कह ‘बाबा’ कविराय, करो प्रायश्चित रो लो।
नश्वर जग को भूल, कृष्ण या राधे बोलो।।

जितना संभव हो सके, नित्य करें कुछ दान।
भूखे को रोटी खिला, बनिए आप महान।।
बनिए आप महान, वही है ईश्वर पूजा।
निर्धन है भगवान, नहीं वह कोई दूजा।
कह ‘बाबा’ कविराय, कमाएंगे अब कितना।
मिलता है प्रतिदान, सदा हम बाँटें जितना।।

माता की सेवा करो, जिनसे हो उत्पन्न।
जितना संभव हो करो, होवोगे सम्पन्न।।
होवोगे सम्पन्न, वही है सब तीर्थाटन।
होगा भारी पाप, करे जब माँ भिक्षाटन।
कह ‘बाबा’ कविराय, उसे क्या विश्व सुहाता।
सुखी रहे संतान, सदा यह चाहे माता।।

जितना संभव हो सके, उतनी भरो उड़ान।
याद रहे होता नहीं, नभ में एक मकान।।
नभ में एक मकान, असंभव सबदिन उड़ना।
थक जाएंगे हाथ, तड़पकर होगा मरना।
कह ‘बाबा’ कविराय, कमाओ सबकुछ उतना।
बचा रहे अस्तित्व, पचा पाओगे जितना।।

थोड़ा रुकिए क्रोध में, गलती कर लें सोच।
क्षमा मांग आगे बढ़ें, उसमें क्या संकोच।।
उसमें क्या संकोच,सभी गलती हैं करते।
लें गलती हम मान, नहीं अतिशय दम भरते।
कह ‘बाबा’ कविराय, श्रेष्ठ है जिसने जोड़ा।
आ जाए जब क्रोध, रखें संयम हम थोड़ा।।

वैसे हैं बिखरे पड़े, सुन्दर मार्ग विभिन्न।
प्रतिभाशाली छोड़ते, खुद अपना पदचिह्न।।
खुद अपना पदचिह्न, स्वयं वह राह बनाता।
सबको अपना मान, हमेशा मार्ग दिखाता।
कह ‘बाबा’ कविराय, करेगा अपने जैसे।
बने एक दृष्टांत, बताए सबको वैसे।।

छोटी सी है ज़िन्दगी, कर लो सबसे प्यार।
छोटी-छोटी बात पर, मत करना तकरार।।
मत करना तकरार, रहोगे प्यारा जितना।
लो सबसे हँस बोल, मिलेगा आदर उतना।
कह ‘बाबा’ कविराय, यही है मात्र कसौटी।
करो नजरअंदाज, बात हो बिल्कुल छोटी।।