भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

खंड-8 / पढ़ें प्रतिदिन कुण्डलियाँ / बाबा बैद्यनाथ झा

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बढ़ता जाता पाप का, क्यों है इतना भार।
प्रश्न पूछती है धरा, कैसे हो उद्धार।।
कैसे हो उद्धार, पूछती है हम सब से।
टूट चुका है धैर्य, सहन करती है कब से।।
करती सतत सचेत, ग्रीष्म का पारा चढ़ता।
देख उग्र उत्पात, पाप फिर भी क्यों बढ़ता।।
 
होती है जब जगत का, पृथ्वी ही आधार।
प्रश्न पूछती है धरा, क्यों है अत्याचार।।
क्यों है अत्याचार, मनुज क्यों निर्मम इतना।
करती करुण पुकार, सताओगे अब कितना।।
सहती अत्याचार, धैर्य फिर भी नहि खोती।
अब सोचें हम आप, कुपित क्यों धरती होती।।

करता हूँ इस पटल पर, बहुत अधिक विश्वास।
इम्तिहान यह ले रहा, कैसे हो पास।।
कैसे हो पास, अंक भी अच्छा आए।
कह दें सब उत्कृष्ट, मान जिससे बढ़ जाए।।
लिखता हूँ हर छन्द, नहीं त्रुटियों से डरता।
जब मिल जाता दोष, त्वरित संशोधन करता।।

जिससे भी की मित्रता, वह निकला बेकार।
इम्तिहान देना पड़ा, मुझको ही हर बार।।
मुझको ही हर बार, बना वह स्वार्थी ऐसा।
बढ़ता जाता लोभ, मात्र वह चाहे पैसा।।
भागा मुझसे दूर, काम जब मेरा उससे।
निकला धोखेबाज, मित्रता की है जिससे।।

हर बेटी है चाहती, मिले पिता का प्यार।
धन वैभव लक्ष्मी बढ़े, हो सुखमय परिवार।।
हो सुखमय परिवार, बढ़े कुल की मर्यादा।
वह चाहे सम्मान, नहीं कुछ चाहे ज्यादा।।
सदा समर्पण भाव, हृदय में प्रेम समेटी।
दोनों कुल का मान, बढ़ाती है हर बेटी।।
  
थी वह चर्चित शायरा, फहमीदा था नाम।
उत्तम रचनाएँ लिखीं, था रियाज उपनाम।।
ता रियाज उपनाम, लिखी हरदम सच्चाई।
देख घटित अन्याय, उसी पर कलम चलाई।।
भारत से था प्रेम, नज़्म में भी है वर्णित।
लिखने में बेबाक, शुरू से थी वह चर्चित।।

एहसास है क्या हमें, बदल रहा है देश?
घटती जाती दीनता, बदल रहा परिवेश।
बदल रहा परिवेश, सीखते हैं हम अक्षर।
बढ़ता जाता ज्ञान, नहीं हो एक निरक्षर।।
जाग गये हम आप, बची जब शेष आस है।
होगा और विकास, सभी को एहसास है।।

अपने अच्छे काम का, जब होगा अहसास।
तब ही होगा आपका, सर्वांगीण विकास।।
सर्वांगीण विकास, प्रगति का मार्ग यही है।
उद्यम से हो काम, सर्वथा बात सही है।।
कर्म अगर श्रमसाध्य, पूर्ण होते सब सपने।
कर्मठ से सम्भाव्य, हुनर जब होते अपने।।

नारी का था व्यथित मन, घरवालों से क्षुब्ध।
जल में निज प्रतिविम्ब को, देख हुई वह मुग्ध।।
देख हुई वह मुग्ध, भुलाकर सारे ग़म को।
घर के सारे लोग, सताते हैं क्यों हमको।।
अब होगा प्रतिकार, त्यागकर निज लाचारी।
करती हूँ आह्वान, शौर्य दिखलाओ नारी।।

आया क्यों साहित्य में, सुन पाएँगे आप।
भोग चुका हूँ मैं बहुत, दुख पीड़ा सन्ताप।।
दुख पीड़ा सन्ताप, समेटे रचना करता।
जो सन्तप्त उदास, चेतना उनमें भरता।।
पाया कवि का रूप, सुयश भी इससे पाया।
लिख लेता हूँ आज, भाव जब जैसा आया।।