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ख़याल-ए-हुस्न में यूँ ज़िंदगी तमाम हुई / रज़ा लखनवी

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ख़याल-ए-हुस्न में यूँ ज़िंदगी तमाम हुई
हसीन सुब्ह हुई और हसीन शाम हुई

बक़ार-ए-इश्क़ बस अब सर झुका दे क़दमों पर
उधर से तेरे लिए सबक़त-ए-सलाम हुई

हर एक अपनी जगह ख़ुश हर इक यही समझा
निगाह-ए-ख़ास ब-तर्ज़-ए-निगाह-ए-आम हुई

नज़र मिली तो तबस्सुम रहा ख़मोशी पर
नज़र फिरी तो ज़रा हिम्मत-ए-कलाम हुई

बस अब तो तुम ने मोहब्बत का ले लिया बदला
मुआफ़ करना जो तकलीफ़-ए-इंतिकाम हुई

है देखने ही का वक़्फ़ा जिसे समझते हैं
‘रज़ा’ वो धूप चढ़ी दिन ढला वो शाम हुई