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ख़िरद को ख़्वाब दिखाओ के कायनात चले / रवि सिन्हा

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ख़िरद[1] को ख़्वाब दिखाओ के कायनात चले
अदब जुनूँ को सिखाओ नई हयात[2] चले

ग़मे-फ़िराक़[3] के नग़्मों में कोइ हाज़िर था
ज़ुबाँ मुझे भी अता कर, तिरी भी बात चले

फ़लक[4] पे जिर्म[5] की गर्दिश[6] मदारे-ज़ीस्त[7] सही
ज़मीं पे ज़ीस्त जहाँ में अदम-सबात[8] चले

मुआशरे[9] से बना शख़्स है इसे देखो
अना[10] वो लफ़्ज़ है जिस लफ़्ज़ में लुग़ात[11] चले

तु रौशनी का गुहर[12] है सदफ़[13]-नशीं क्यूँ है
चलो निकल के जहाँ तक अन्धेरी रात चले

शब्दार्थ
  1. बुद्धि (Reason)
  2. जीवन (Life)
  3. वियोग का दुःख (grief of separation)
  4. आसमान (Sky)
  5. पिण्ड (Body)
  6. चक्कर लगाना (to revolve)
  7. जीवन का आधार (Life’s foundation)
  8. बिना स्थिरता के (without permanence)
  9. समाज, सभ्यता (Society, Civilization)
  10. आत्म, ख़ुदी (Self)
  11. शब्दकोष
  12. रत्न (Gem)
  13. सीपी (Seashell)