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ख़ुद को कहते हैं उसका शैदाई / कांतिमोहन 'सोज़'

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ख़ुद को कहते हैं उसका शैदाई[1]
हमसे होगी न उसकी रुसवाई ।।

आह दिल से ज़बान की दूरी
बात आई गई गई आई ।

आसमां कितना छटपटाया था
क्या उसे डस गई थी तन्हाई ।

उसका अन्दाज़ था जुदागाना
यूँ हँसाया कि आँख भर आई ।

कोठरी दिल की तंग थी कितनी
याद भी उसमें तह-ब-तह आई ।

अब तमाशा ज़रूर होना था
हम तो ख़ुद बन गए तमाशाई ।

सारे आदिल[2] थे सारे मुंसिफ़[3] थे
सोज़ की पर हुई न सुनवाई ।।

शब्दार्थ
  1. आशिक़
  2. इंसाफ़पसन्द
  3. इंसाफ़ करने वाले