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ख़ुद को ख़ुद ही झुठलाओ मत / 'सज्जन' धर्मेन्द्र

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ख़ुद को ख़ुद ही झुठलाओ मत।
सच बोलो तो हकलाओ मत।

भीड़ बहुत है मर जाएगा,
अंधे को पथ बतलाओ मत।

दिल बच्चा है ज़िद कर लेगा,
दिखा खिलौने बहलाओ मत।

दुनिया बदनीयत कह देगी,
चोट किसी की सहलाओ मत।

सभी कुरेदेंगे फिर फिर से,
घाव किसी को दिखलाओ मत।