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खिंचता जाता तेज, तिमिर तनता, क्या फ़ेरा / जानकीवल्लभ शास्त्री

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खिंचता जाता तेज, तिमिर तनता, क्या फेरा
अरे, सवेरा भी होगा या सदा अँधेरा ?

रहे अँधेरा, ये समाधियाँ दिख जायेंगी -
घास-पात पर शबनम से कुछ लिख जायेंगी !
कभी पढ़ेंगे लोग - न सब दिन अपढ़ रहेंगे,
सब दिन मूक व्यथा न सहेंगे, कभी कहेंगे -

'अंधकार का तना चंदोवा था जन-भू पर,
दीप उजलते, जलते थे, बस ऊपर-ऊपर ।
जीवित जले हुए कीड़ों की ये समाधियाँ,
दीप जलाना मना, यहाँ उठती न आँधियाँ ।


दीप जलाना अगर रस्म भर, इधर न आना !
दीप दिखाकर अंधकार को क्या चमकाना !!
('शिप्रा')