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खुली-खुली-सी खिड़कियाँ, लुटी-लुटी-सी बस्तियाँ / गुलाब खंडेलवाल
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खुली-खुली-सी खिड़कियाँ, लुटी-लुटी-सी बस्तियाँ
बसे थे जो कभी यहाँ, गए वे छोड़कर कहाँ!
कहाँ है प्यार की क़सम! कहाँ हो तुम, कहाँ हैं हम!
ढलान पर क़दम-क़दम, उतर रहा है कारवाँ
मिलो न चाहे उम्र भर, मगर हो दिल के हमसफ़र
जली न आग जो उधर, उठा कहाँ से यह धुआँ
कभी जो उनकी एक झलक, नज़र से थी गयी छलक
उसीकी धुन में आज तक, फिरे हैं हम जहाँ-तहाँ
गुलाब! अब भी डाल पे, भले ही तुम हो खिल रहे
कहाँ हैं सुर बहार के! कहाँ हैं उनकी शोख़ियाँ