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खुशियाँ कम आयीं हिस्से में दुख ही अधिक सहे / अमन चाँदपुरी

खुशियाँ कम आयीं हिस्से में दुख ही अधिक सहे

अजब दौर है शीश झुकाकर यहाँ पड़े चलना
हम बंजारे, सीधे-सादे क्या जानें छलना

मन घंटों रोया, तब जाकर थोड़े अश्रु बहे

हमने केवल उन राहों पर छोड़े हैं पदछाप
भुगत रहीं थीं, जो सदियों से ऋषि-मुनियों के शाप

विष ही पिया उम्र भर हमने लेकिन कौन कहे

दो रोटी की चिंता में ही जीवन बीत गया
लगता है सुख का घट धीरे-धीरे रीत गया

आशा की दरकीं दीवारें, सपने सभी ढहे