भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

खैंची लबों ने आह कि सीने पे आया हाथ / 'अना' क़ासमी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

खैंची लबों ने आह कि सीने पे आया हाथ ।
बस पर सवार दूर से उसने हिलाया हाथ ।

महफ़िल में यूँ भी बारहा उसने मिलाया हाथ ।
लहजा था ना-शनास[1] मगर मुस्कुराया हाथ ।

फूलों में उसकी साँस की आहट सुनाई दी,
बादे सबा[2] ने चुपके से आकर दबाया हाथ ।

यँू ज़िन्दगी से मेरे मरासिम[3] हैं आज कल,
हाथों में जैसे थाम ले कोई पराया हाथ ।

मैं था ख़मोश जब तो ज़बाँ सबके पास थी,
अब सब हैं लाजवाब तो मैंने उठाया हाथ ।

शब्दार्थ
  1. अपरिचित
  2. सुबह की ख़ुशबूदार हवा
  3. तअल्लुक़ात