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खो नहीं जाना कभी तुम / मनीषा शुक्ला

ढूंढना आसान है तुमको बहुत, पर
मीत मेरे, खो नहीं जाना कभी तुम

पीर की पावन कमाई, चार आंसू, एक हिचकी
मंत्र बनकर प्रार्थनाएं मंदिरों के द्वार सिसकी
पर तुम्हारी याचनाओं को कहाँ से मान मिलता,
देवता अभिशप्त हैं ख़ुद, और है सामर्थ्य किसकी?
शिव नहीं जग में, प्रणय जो सत्य कर दे
माँगने हमको नहीं जाना कभी तुम

तृप्ति से चूके हुए हैं, व्रत सभी, उपवास सारे
शूल पलकों से उठाए, फूल से तिनके बुहारे
इस तरह होती परीक्षा कामनाओं की यहां पर
घण्टियों में शोर है पर देवता बहरे हमारे
महमहाए मन, न आए हाथ कुछ भी
आस गीली बो नहीं जाना कभी तुम

जग न समझेगा मग़र, हम जानते हैं मन हमारा
प्रीत है पूजा हमारी, मीत है भगवन हमारा
हम बरसते बादलों से क्यों कहें अपनी कहानी
और ही है प्यास अपनी, और है सावन हमारा
गुनगुनाएं सब, न समझे पीर कोई
गीत का मन हो नहीं जाना कभी तुम