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गउवाँ गेरउवाँ सहर भये बाबा / विद्या विन्दु सिंह

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गउवाँ गेरउवाँ सहर भये बाबा
सहर भये बाबा, जहर भये बाबा।

नाहीं आये हरदी नेवत लिहे बभना।
खुलि गयीं निंदिया, टूटि गये सपना।
सब सुख यहर वहर भये बाबा।
गउवाँ गेरउवाँ सहर भये बाबा

देवरा क चुटकी, भउजी ठिठोलिया
ननदी क ठुनकी, वसरवा क बतिया
गितिया, कहनिया नोहर भये बाबा।
गउवाँ गेरउवाँ सहर भये बाबा

ठनकति हँसी न गंध सोंधी गुजरिया
हरहा न गोरू सब सूनि भईं सरिया
मन जैसे खुँटिया क हर भये बाबा।
गउवाँ गेरउवाँ सहर भये बाबा

कैसे केहू रहिया बचाय चले बाबा
नेहिया क दियना लेसाय चलै बाबा
नये-नये चोरवा जबर भये बाबा।
गउवाँ गेरउवाँ सहर भये बाबा।

मनवा म बाँधि कै विपति गठरिया
केहू न बतावै आपन जियरा हवलिया
नोहर हँसी कै पहर भये बाबा।
गउवाँ गेरउवाँ सहर भये बाबा।

बाबा अकेले बइठे तपता बारे,
पैरा के चारिउ ओर बिड़वा सँवारे
घर घर सनीमा के घर भये बाबा
गउवाँ गेरउवाँ सहर भये बाबा।

हरदी औ सरसों के बुकवा हेराने
टेसू के फूल नाहीं उझिला देखाने
गाँव गाँव बिउटी पारलर भये बाबा।
गउवाँ गेरउवाँ सहर भये बाबा।

गोरस गाँव से उड़ि कै सहर गये
बोतल जहर घर-बाहर पसरि गये।
खोय बंसी बिरहा कै स्वर गये बाबा।
गउवाँ गेरउवाँ सहर भये बाबा।

काली क चौरा न लपसी सोहारी
नाहीं पूजै पुरखिन अब डिउहारी
नये-नये देउता उपर भये बाबा।
गउवाँ गेरउवाँ सहर भये बाबा।