भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

गट-गट सूखे एक / गगन गिल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

गट-गट सूखे एक प्यास


कुछ भूखे

कुछ रूखे

कोई पैने

कोई चपटे


काँटे उगे वहाँ

कई हज़ार


गट-गट पले एक प्यास


कभी माथा
कभी चमड़ी
कभी हड्डी
कभी पसली


फाड़ लिखे उसने
लेख गजब
सिर में गुप-चुप चिने एक बात


कभी दिखे

कभी छिपे

कभी भटके

भटकाए


घुटनों में अपने ही सिर से थक जाए


गट-गट उड़े एक प्यास