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गम्भर (दो) / कुमार कृष्ण

गाँव के लगभग हर आदमी के पास
होती है उसकी छोटी सी गम्भर
अपने हल्क़ में उतारता है जिसे वह घूँट-घूँट
पीता है उसे बूँद-बूँद
महसूस करता है अपने भीतर
उसकी तमाम ऊर्जा-एनर्जी
उसकी हरकतें-शरारतें
उसकी सरसराहट

गम्भर को गम्भर बनने में लग जाते हैं
अनगिनत वर्ष
गम्भर जन्म से ही जानती है भागना
वह दौड़ते हुए, भागते हुए
लड़ते हुए, लड़खड़ाते हुए
गुज़ार देती है अपनी पूरी उम्र
उसकी नियति में है भागना
आ रही है सदियों से भागती
भागते हुए ही पार करनी हैं उसे
अभी और कई सदियाँ।