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गरीब स्त्री / अंकिता जैन

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दुबली, पतली, छोटी सी
काली, लंबी, मोटी सी
वो हर रूप और हर रंग की
स्त्री ही तो है
नहीं, वह स्त्री नहीं
बस एक गरीब है

पेट बढ़ाए, कमर झुकाए
सांस फुलाए, आस लगाए
वो हर भाव, और हर ढंग की
स्त्री ही तो है
नहीं, वह स्त्री नहीं
बस एक गरीब है

पत्थर तोड़े, बासन रगड़े
कपड़े धोती, मैला ढोती
वो हर काम और हर मकाम पर
स्त्री ही तो है
नहीं, वह स्त्री नहीं
बस एक गरीब है

वो बिकती है बाजारों में
लुट जाए घर-बारों में
वो छलनी कपड़े से लाज बचाती
स्त्री ही तो है
नहीं, वह स्त्री नहीं
बस एक गरीब है

भीख माँगती, देहरी लाँघती
जूठा खाती, ढोर हाँकती
वो हर दर्द का थूक गटकती
स्त्री ही तो है
नहीं, वह स्त्री नहीं
बस एक गरीब है।

वो अधनंगी रहने को मजबूर थी
क्योंकि अमीरों के लिए वो मजदूर थी
वो एक रात की रखैल बनी
क्योंकि नौकर मालिक से नहीं कर सकता कहा-सुनी
उसे बेचा जाना निर्धनता
और खरीदा जाना अमीरी है,
जब हम ऊँचे कद कह देते हैं
ये लाचारी है, गरीबी है।