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ग़ज़ल को गीत बनाऊँ तो बोलो क्या दोगे / सुरेन्द्र सुकुमार

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ग़ज़ल को गीत बनाऊँ तो बोलो क्या दोगे?
आग पानी में लगाऊँ तो बोलो क्या दोगे?

ग़ज़ल का मतलब है-- प्रिया से बातें,
ग़ज़ल में भूख दिखाऊँ तो बोलो क्या दोगे?

लोग तो माँ पर लिखते हैं, रोज़ ही ग़ज़लें,
मैं तवायफ़ पे लिख जाऊँ, तो बोलो क्या दोगे?

दर्द जहाँ हो चाहे, जैसा हो चाहे, जिसका हो,
पौध इनकी ही उगाऊँ तो बोलो क्या दोगे?

ग़ज़ल हो, गीत-मुक्तक हो या कि रुबाई हो
दर्द को सब में ले आऊँ, तो बोलो क्या दोगे?