भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ग़ालिब की हवेली / गुरप्रीत

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मैं और मित्र कासिम गली में
ग़ालिब की हवेली के सामने
हवेली बंद थी
शायद चौंकीदार का
मन नहीं होगा
हवेली को खोलने का
चौंकीदार, मन और ग़ालिब मिल कर
ऐसा कुछ सहज ही कर सकते हैं
हवेली के साथ वाले चौबारे से
उतरा एक आदमी और बोला
"हवेली को उस जीने से देख लो "
उसने सीढ़ी की तरफ इशारा किया
जिस से वो उतर कर आया था
ग़ालिब की हवेली को देखने के लिए
सीढ़ीयों पर चढ़ना कितना जरूरी है
पूरे नौ बर्ष रहे ग़ालिब साहब यहाँ
और पूरे नौ महीने वो अपनी माँ की कोख में
बहुत से लोग इस हवेली को
देखने आते हैं
थोड़े दिन पहले एक अफ्रीकन आया
सीधा अफ्रीका से
केवल ग़ालिब की हवेली देखने
देखते देखते रोने लगा
कितना समय रोता रहा
और जाते समय
इस हवेली की मिट्टी अपने साथ ले गया
चुबारे से उतरकर आया आदमी
बता रहा था, एक साँस में सब कुछ
मैं देख रहा था उस अफ्रीकन के पैर
उसके आंसुओ के शीशे में से, स्वय को
कहाँ कहाँ जाते हैं पैर
उस सभी जगह जाना चाहते हैं पैर
जहा जहा जाना चाहते हैं आँसू
मुझे आँख से टपका हर आँसू
ग़ालिब की हवेली लगता है.