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गाँधी और मैं / असंगघोष

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मैं
और
वह
वह और मैं
वह माने गाँधी
मैं याने मैं

दोनों ही
देखते हैं लगातार
एक दूसरे को रोज
बिला नागा

वह हाथ में
लाठी लिए
मेरी ओर तेजी से
चले आने की मुद्रा में
एक पाँव आगे बढ़ाए
दूसरा जमाए पेडस्टल पर
स्थिर खड़ा है
जरा भी हिला-डुला तो
गिर न जाए
औंधे मुँह
जमीन पर
औ उसे कोई उठाने न आए

मैं काम करते रहता हूँ
फुर्सत मिलते ही
नजरें मिलती हैं

चश्मे के पार
गाँधी की नजरों में
बार-बार
एक ही प्रश्न दिखाई देता है
पुनः पूना पैक्ट करोगे?

मैंने कहा नहीं बाबा!
पहले ही पैक्ट में
तुमने भूखे रह बाबा को घेर
हमें हरिजन कह ह लिया
अब बख्शो
कोई और सम्बोधन नहीं चाहिए
दलित हैं
दलित ही रहने दो
तुम्हारी अहिंसा का
सहारा ले
दमित हैं
शोषित हैं
अब तक
अपनी रक्षा के लिए
कम अज कम
हमें हथियार तो उठाने दो

हम खुद ही लड़ेंगे
अपनी लड़ाई
तुम्हारे सिद्धान्त और अहिंसा
हमारे हित में नहीं हैं
वरना तुम यूँ ही बुत की तरह
बीच चौराहे पर टँगे नहीं रहते
तुम्हारा अनुसरण करते
अनुयायी
और देश का हर नागरिक
अपने घर में बिठा पूजता तुम्हें

तुम्हारे सिद्धान्त थोड़े भी प्रासंगिक होते तो
निश्चित ही तुम रोक पाते
अपने उन चेलों को जो
तुम्हें याद करते हैं केवल
2 अक्टूबर, 30 जनवरी को हर साल
चढ़ा आते हैं
फूलमालाएँ तुम्हारे बुत पर
कुछ पड़े रहते हैं दारू पीये गटर में
बचे खुचे तथाकथित अनुयायी
तुम्हारी धर्मनिरपेक्षिता का मजाक उड़ाने
तुम्हारे हाथ पर सेफरन कलर का
दुपट्टा बाँध आते हैं
तुम्हारी ही जमीं पर
तुम हो कि अपनी ही जिद्द पर
अड़े हो खड़े हो

तुम किंकर्तव्यविमूढ़ हो स्थिर ही खड़े रहो
चौराहे के बीच जहाँ से कोई रास्ता
तुम्हारे सिद्धान्तों की ओर नहीं जाता
न ही पेडस्टल से लाठी उठाना
वरना नीचे गिर जाओगे
जहाँ कोई तुम्हें उठाने भी नहीं आएगा

भूल जाओ पूना पैक्ट
वह हमारे लिए कलंक है
हमें तुम्हारे सिद्धान्त नहीं चाहिए
उन्हें अपनी बकरियों को ही चर जाने दो
हमारे पास बाबा साहेब का दिखाया रास्ता है
हम उसी पर चलेंगे।