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गाँधी के बंदर / असंगघोष

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गाँधी का एक बंदर
अपने होंठों पर उँगली रखे
मौन है
वह जानता है
जो बोलेगा
वही साँकल खोलेगा
फिर वह क्यो बोले?
बोलकर
साँकल क्यों खोले?
आखिर गाँधी का बंदर है,
वह उसी तरह चुप्पी साधे है
जैसे दूसरा
देखना ही नहीं चाहता
तीसरा सबका बाप है
कानों में उंगली डाले बैठा है
किसी की पीड़ा
सुनना नहीं चाहता

अब हम अपनी व्यथा
कहें तो किससे कहें

एक पूना पैक्ट वाला गाँधी
बचा है
वह भी लाठी ले
भाग रहा है लगातार

कहीं थोड़ा रुके तो कहें
उसके अनुयायियों के बारे में
तीनों बंदरों के बारे में
देश के बारे में
उसके भागने के बारे में
आखिर रुके तो सही।