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गाँव का बचपन / रमेश तैलंग

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गाँव से आकर भी न भूलीं
हमको अपने गाँव की गलियाँ।
खेत के ऊँचे-ऊँचे गन्ने
नन्ही-नन्ही मटर की फलियाँ।

पोखर का वो गँदला पानी,
नानी की कोठरी पुरानी,
मिट्टी-धूल में सनकर आना,
धमा-चौकड़ी खूब मचाना,
छुप-छुपकर पेड़ों पर चढ़ना,
और तोड़ना कच्ची अमियाँ।

कडुवी वो दातुनें नीम की,
खड़-खड़ गाड़ी रामदीन की,
बंबे पर जा खूब नहाना,
साथ बैठकर सबके खाना,
सुबह-शाम आरती-प्रसाद में
पाना मिसरी की दो डलियाँ।