गाँव मेरा आजकल दहशतज़दा है दोस्तो ।
इसकी क़िस्मत में न जाने क्या लिखा है दोस्तो ।
सिर हथेली पर है उनके हाथ में बन्दूक है,
पूछते हैं— कौन, किससे, क्यों ख़फ़ा है दोस्तो ।
घर पे मँडराते हुए बारूद के बादल को देख,
सहमी-सहमी औरतें, बच्चे, हवा है दोस्तो ।
चौकियों में भी सुरक्षित जब नहीं हैं वर्दियाँ,
घर निहत्था मौत के आगे खड़ा है दोस्तो ।
बुर्जुआजी की ज़रूरत पालती है धर्म को,
धर्म ऊँचा, आदमी बौना हुआ है दोस्तो ।